9:14श्रीभगवानुवाच

Raja Vidya Raja Guhya Yoga

राजविद्या राजगुह्य योग

Sanskrit Shloka

सततं कीर्तयन्तोमां यतन्तश्च दृढव्रताः। नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥ 9:14॥

Padacheeda (Word-by-Word)

सततम् कीर्तयन्तः माम् यतन्तः च दृढ-व्रताः, नमस्यन्तः च माम्, भक्त्या नित्य-युक्ताः उप-आसते।

Anvaya (Construction)

दृढ-व्रताः (दृढ़ संकल्प वाले) सततम् (सदैव) कीर्तयन्तः (कीर्तन करते हुए) च (और) यतन्तः (प्रयास करते हुए), च (और) माम् (मुझे) नमस्यन्तः (नमस्कार करते हुए) नित्य-युक्ताः (सदैव जुड़े हुए) भक्त्या (भक्ति से) माम् (मुझे) उप-आसते (पूजते हैं)।

Meaning

Hindi

निरंतर मेरा कीर्तन करते हुए, प्रयत्नशील, दृढ़व्रती मनुष्य मुझे नमस्कार करते हुए, नित्ययुक्त होकर भक्तिपूर्वक मेरी उपासना करते हैं।


English

With Me always in mind, firm in their faith, ever singing My glory and chanting My names—such great souls, working assiduously, pay Me their obeisance and worship Me with intense love and devotion. (9:14)

Commentary

Hindi

कीर्तन' का अर्थ है— वर्णन करना, प्रशंसा करना, उत्सव करना (वी. एस. आप्टे का प्रैक्टिकल संस्कृत-अंग्रेज़ी शब्दकोश)। इसलिए, यह भगवान और उनके जीवन तथा उनकी लीलाओं के बारे में बातें करना, तृप्त होकर उनकी प्रशंसा करना है। यह वाद्य-यंत्रों-सहित गा कर एवं नृत्य-सहित करना और भी आनंददायी होता है। कभी-कभी भक्त गा कर और नृत्य करते हुए समूह में झाल-मंजीरे के साथ सिर्फ नाम का ही उच्चारण करते हैं, जैसे— सीता-राम, राधे-श्याम, हरि बोल आदि। यह सब 'कीर्तन' या 'संकीर्तन' है। अलग-अलग युगों में अलग-अलग आध्यात्मिक साधन अपनाए जाते हैं। भागवतपुराण के अनुसार कलियुग में संकीर्तन भगवद्प्राप्ति का श्रेष्ठ साधन है, और इसी से सारे स्वार्थ-परमार्थ सध जाते हैं— कलिं सभाजयन्त्यार्या गुणज्ञाः सारभागिनः। यत्र सङ्कीर्तनेनैव सर्वस्वार्थोऽभिलभ्यते॥ (श्लोक 36, अध्याय 5, एकादश स्कंध, भागवतपुराण) भागवतपुराण के दशम स्कंध का अंतिम श्लोक कीर्तन की महिमा को यों रेखांकित करता है— मर्त्यस्तयानुसवमेधितया मुकुन्द-श्रीमत्कथाश्रवणकीर्तनचिन्तयैति। तद्धाम दुस्तरकृतान्तजवापवर्गं ग्रामाद्वनं क्षितिभुजोऽपि ययुर्यदर्थाः॥ (श्लोक 50, अध्याय 90, दशम स्कंध) अर्थ: मुकुंद की कथा के प्रतिदिन सुनने, कीर्तन करने और उनका चिंतन करते रहने से मनुष्य तीव्र गति से भगवान के मोक्षदायी धाम में जा पहुँचता है, जहाँ पहुँचने के लिए राजा लोग अपना स्थान छोड़कर वन में जाते रहे हैं।