Sankhya Yoga
सांख्य योग
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्। अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥ 2:8॥
न हि प्र-पश्यामि मम अप-अनुद्यात् यत् शोकम्, उत्-शोषणम् इन्द्रियाणाम्; अवाप्य भूमौ अ-सपत्नम्, ऋद्धम्, राज्यम्, सुराणाम् अपि च आधिपत्यम्!
हि (कारण कि) भूमौ (पृथ्वी पर) अ-सपत्नम् (शत्रु-रहित) ऋद्धम् (धन-धान्य-समृद्धि) राज्यम् (राज्य) च (तथा) सुराणाम् (देवताओं का) आधिपत्यम् (आधिपत्य) अवाप्य (मिल जाय) अपि (तो भी) न (नहीं) प्र-पश्यामि (देखता हूँ) यत् (जो) मम (मेरा) इन्द्रियाणाम् (इंद्रियों को) उत्-शोषणम् (सुखाने वाला) शोकम् (शोक है) अप-अनुद्यात् (दूर हो जाय)।
Hindi
पृथ्वी पर निष्कंटक समृद्ध राज्य और देवताओं का स्वामित्व प्राप्त करके भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ, जो मेरी इंद्रियों को सुखाने वाले इस शोक का निवारण कर सके!
English
Even if I were to gain unchallenged dominion over the bountiful earth or the heaven, I fail to envision a path that would alleviate the anguish clouding and debilitating my senses. (2:8)