Sankhya Yoga
सांख्य योग
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्। नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ 2:57॥
यः सर्वत्र अन्-अभि-स्नेहः, तत् तत् प्राप्य शुभ-अशुभम्, न अभि-नन्दति, न द्वेष्टि— तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।
यः (जो) सर्वत्र (सर्वत्र) अन्-अभि-स्नेहः (बिना किसी विशेष स्नेह के) तत् तत् (उस-उस) शुभ-अशुभम् (शुभ या अशुभ) प्राप्य (प्राप्त करके) न (नहीं) अभि-नन्दति (प्रसन्न होता है), न (न ही) द्वेष्टि (द्वेष करता है) तस्य (उसकी) प्रज्ञा (बुद्धि) प्रतिष्ठिता (स्थिर है)।
Hindi
जो मनुष्य सभी चीजों में अनुराग-रहित हुआ, उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न उनसे द्वेष करता है {अर्थात सदा समभाव में बना रहता है}, उसकी प्रज्ञा (बुद्धि) स्थिर है।
English
He who has shed his fondness for everything worldly, and who neither rejoices nor loathes as he receives good or evil, is known as Sthitaprajna— the one whose mind is firmly stabilized in divine consciousness. (2:57)