Sankhya Yoga
सांख्य योग
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥ 2:56॥
दुःखेषु अन्-उद्विग्न-मनाः, सुखेषु वि-गत-स्पृहः, वीत-राग-भय-क्रोधः— स्थित-धीः मुनिः उच्यते।
दुःखेषु (दुःख में) अन्-उद्विग्न-मनाः (जिसका मन विचलित नहीं होता) सुखेषु (सुख में) वि-गत-स्पृहः (जो अभिलाषा से मुक्त रहता है) वीत-राग-भय-क्रोधः (जो आसक्ति, भय और क्रोध से मुक्त होता है) मुनिः (ऐसा मुनि) स्थित-धीः (स्थितप्रज्ञ) उच्यते (कहा जाता है)।
Hindi
दुःख आने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में जो सुख की लिप्सा से भी मुक्त रहता है, तथा जिसके राग (आसक्ति), भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है।
English
He who remains calm in the midst of suffering; who, amidst mirth, remains free from longing for pleasures; and who has freed himself from attachment, fear, and anger is known as Sthitaprajna— the one whose mind is firmly stabilized in divine consciousness. (2:56)
Hindi
इस स्थिति की समझदारी को विकसित करने में यहाँ एक महान उदाहरण सहायक हो सकता है। श्रीराम के राजतिलक की घोषणा होती है, और सर्वत्र उल्लास मनना शुरू होता है, लेकिन श्रीराम इस सुख की घड़ी में भी राजसुख से 'सुखेषु विगतस्पृहः' रहते हैं। कुछ ही पहर के बाद श्रीराम को, सौतेली माँ कैकेयी के षड्यंत्र से, 14 वर्षों का वनवास मिलता है। लेकिन श्रीराम के अंदर वनगमन के समाचार से कोई दुःख या विषाद नहीं होता, और वे 'दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः' रहते हैं। वनगमन के समय श्रीराम की मनोदशा का एक वर्णन देखिए– पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर। बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर॥ मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू। सब कर सब बिधि करि परितोषू ॥ चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी। रहइ न राम चरन अनुरागी॥ (मानस, अयो.165/165:1) अर्थात, पिता की आज्ञा से श्री रघुवीर ने राजकीय वस्त्र और आभूषण त्याग दिए और वल्कल-वस्त्र पहन लिए। उनके हृदय में न कुछ विषाद था, न हर्ष! उनका मुख प्रसन्न था, मन में न राग था, न रोष। सबका सब तरह से संतोष कराकर वे वन की ओर चले। यह है स्थितप्रज्ञता का उदाहरण!