Sankhya Yoga
सांख्य योग
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ 2:58॥
यदा सं-हरते च अयम् कूर्मः अङ्गानि इव सर्वशः, इन्द्रियाणि इन्द्रिय-अर्थेभ्य— तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।
च (और) कूर्मः (कछुआ) सर्वशः (सभी ओर से) अङ्गानि (अंगों) इव (जैसे) (समेट लेता है, वैसे ही) यदा (जब) अयम् (यह व्यक्ति) इन्द्रिय-अर्थेभ्य (इन्द्रियों के विषयों से) इन्द्रियाणि (इन्द्रियों को) सं-हरते (समेट लेता है) तस्य (उसकी) प्रज्ञा (बुद्धि) प्रतिष्ठिता (स्थिर है)।
Hindi
कछुआ सब ओर से अपने अंगों को जैसे समेट लेता है, वैसे ही जब मनुष्य इंद्रियों के विषयों से {जब चाहे, बिना किसी कष्ट के} इंद्रियों को समेट लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है, ऐसा समझना चाहिए।
English
When a man can withdraw his sense organs from their objects at will, much like a tortoise can withdraw its limbs into its shell, he is known as Sthitaprajna— the one whose mind is firmly stabilized in divine consciousness. (2:58)
Hindi
महायोगी कर्दम ऋषि और उनकी पत्नी मनु-कन्या देवहूति के संबंधों का प्रसंग श्रीमद्भागवतपुराण के तृतीय स्कंध में पढ़ना इस श्लोक का मर्म समझने में सहायक हो सकता है। देवहुति के मनोनुकूल लंबी अवधि तक रतिविलास और भोग तथा फिर भोग से सहज ही पूर्ण निवृत्ति प्राप्त कर कर्दम ऋषि का, अपने पूर्व निश्चय के अनुकूल, वन-गमन—यह जब चाहे तब कछुए की तरह इंद्रियों को उनके विषयों से पूरी तरह समेट लेने की क्षमता का एक शास्त्रीय उदाहरण है।