9:8श्रीभगवानुवाच

Raja Vidya Raja Guhya Yoga

राजविद्या राजगुह्य योग

Sanskrit Shloka

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः। भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥ 9:8॥

Padacheeda (Word-by-Word)

प्रकृतिम् स्वाम् अवष्टभ्य, वि-सृजामि पुनः पुनः, भूत-ग्रामम् इमम् कृत्स्नम्, अ-वशम् प्रकृतेः वशात्।

Anvaya (Construction)

स्वाम् (मैं अपनी) प्रकृतिम् (प्रकृति को) अवष्टभ्य (वश में करके), प्रकृतेः (प्रकृति के) वशात् (वश) अ-वशम् (विवश हुए) इमम् (इस) कृत्स्नम् (संपूर्ण) भूत-ग्रामम् (सभी भूतों के समूह को) पुनः पुनः (पुनः पुनः) वि-सृजामि (सृजन करता हूँ)।

Meaning

Hindi

अपनी प्रकृति को अंगीकार करके प्रकृति के वशीभूत रहने वाले समस्त भूत-समुदाय को मैं बार-बार रचता हूँ।


English

By subordinating and re-energizing My Nature, I, again and again, bring into being the cosmos with its objects and creatures—all helplessly subject to the laws of Nature. (9:8)

Commentary

Hindi

भगवद् गीता में बातें संक्षेप में की गई हैं, क्योंकि यह युद्धभूमि में होता हुआ संवाद था। पुराणों में प्रक्षिप्त अंश बड़ी मात्रा में हैं। इनमें भागवत महापुराण में यह थोड़ा कम प्रतीत होता है। भागवत में ब्रह्मांड की सृष्टि का वर्णन विस्तार में कई स्थलों पर किया गया है, जिनमें सटीक तौर पर बिल्कुल एक ही क्रम नहीं दिया है — हालाँकि मोटे तौर पर एक ही प्रकार का विवरण है। जैसा कि पिछले श्लोक की विवेचना में कहा गया, जगत की सृष्टि का आरंभ तो प्रकृति के गुणों में क्षोभ उत्पन्न कर परब्रह्म परमेश्वर ही करते हैं, किन्तु फिर अव्यक्त प्रकृति से उत्पन्न महत्तत्त्व, पंचमहाभूत और तन्मात्रा आदि तत्त्वों को लेकर ब्रह्माजी को जगत की रचना करने का दायित्व परमेश्वर द्वारा दिया जाता है — ऐसा देखने में आता है। जैसे मिट्टी की रचना कुम्हार नहीं करता, लेकिन उस मिट्टी से घड़े वही बनाता है — वैसे ही प्रकृति द्वारा प्रदत्त सामग्री को लेकर ब्रह्माजी जगत का निर्माण करते हैं, ऐसा भागवत पुराण का मंतव्य है। फिर भी, अगर ब्रह्माजी ही नारायण की प्रेरणा और मदद से जगत का निर्माण करते हैं तो भी उसके पीछे शक्ति परमेश्वर की ही होती है— ऐसा भागवत पुराण भी स्पष्ट करता है। "परमेश्वर ने स्वयं ही अपने को सृष्टि-निर्माण के लिए ब्रह्मा के रूप में रूपांतरित किया", यह भी कहा है। इसलिए भगवद् गीता के इस और अन्य श्लोकों से भागवत पुराण का कोई विरोध प्रतीत नहीं होता है।


English

One of the most revered among the companion scriptures of the Holy Gitā is the Bhāgawata Purāna, which has likely experienced fewer interpolations compared to many other Purānas over several millennia. The Bhāgawata Purāna also offers a detailed account of the process of Creation. According to this Purāna, God initiates Creation by perturbing the equilibrium of the three Gunas or Elements within the Unmanifest Nature. When "awakened" in this manner, the Unmanifest Nature gives rise to Mahat-tattvas (महत्तत्त्व), Panch-mahābhutas (पंचमहाभूत), and Tanmātrās (तन्मात्रा), among others. These constitute the primordial substances from which the physical universe and its objects are fashioned by the Semi-God Brahmā, who is the first to be brought into existence through God’s initial perceptible manifestation—Bhagawān Nārāyana (Vishnu). However, in the ultimate sense, it is God-the-Supreme who brings the universe, its objects, and living beings into existence.