Raja Vidya Raja Guhya Yoga
राजविद्या राजगुह्य योग
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्। भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः॥ 9:5॥
न च मत्-स्थानि भूतानि, पश्य मे योगम्-ऐश्वरम्, भूत-भृत् न च भूत-स्थः मम आत्मा, भूत-भावनः।
भूतानि (सारा सजीव एवं निर्जीव जगत) मत्-स्थानि (मेरे स्थान में) न (नहीं हैं) मे (मेरी) ऐश्वरम् (ईश्वरीय) योगम् (योग-शक्ति को) पश्य (देखो) भूत-भृत् (सारे सजीव-निर्जीव जगत का पालनकर्ता) च (और) भूत-भावनः (सारे सजीव-निर्जीव जगत को उत्पन्न करने वाला) च (भी) मम (मेरी) आत्मा (आत्मा) भूत-स्थः (भूतों के भीतर स्थित) न (नहीं है)।
Hindi
वे सब भूत मेरे अंदर स्थित नहीं {दिखते} हैं; किंतु मेरी ईश्वरीय योग-शक्ति को देखो कि भूतों का धारण-पोषण करने वाली और भूतों को उत्पन्न करने वाली मेरी आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है।
English
Behold my mystical magnificence: the cosmic existences do not abide within Me, and neither does my Self reside within them, despite my pervasive presence among them all. Nevertheless, I stand as their sole Creator and Sustainer.(9:5)
Hindi
याद करें भगवान का वह कथन — "अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः" (10:20), अर्थात मैं सभी भूतों (जीवों की देहों) में आत्मा के रूप में स्थित हूँ। उस कथन से यहाँ विरोध दिखेगा। लेकिन यह विरोध का आभास है, विरोध नहीं। यहाँ यह भी कहते हैं कि भूत (संसार) भी उनमें नहीं हैं! किस अर्थ में वे भौतिक संसार में हैं, और किस अर्थ में वे भौतिक संसार में नहीं हैं — यह रहस्य समझने की चीज है। फिर किस अर्थ में भूत उनमें हैं और किस अर्थ में भूत उनमें नहीं हैं — यह रहस्य भी समझने की जरूरत है। इस 'पैराडॉक्स' या अंतर्विरोधपूर्ण कथन को समझना एक चुनौती है। इस विचार को भगवान ने शुरू (9:2) में ही "राजगुह्य" (अत्यंत गोपनीय) कहा है। वास्तव में, इस श्लोक में प्रकृति द्वारा उत्पन्न किए गए दृश्यमान ब्रह्मांड और परमेश्वर के बीच जो आधारभूत अंतर है, उसके रहस्य की ओर संकेत किया गया है। यद्यपि परमेश्वर पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त हैं, कण-कण में व्याप्त हैं — जैसा कि अभी-अभी उन्होंने कहा था — तथापि सर्वत्र "व्याप्त होने" और ईश्वर की "आत्मा" के भौतिक अस्तित्व में "निवास करने" में सूक्ष्म अंतर है। भौतिक जगत तो वास्तव में स्वप्नवत है। इसका तो अस्तित्व ही "असम्प्रतिष्ठित" है (15:3)। अगर परमेश्वर इसमें 'निवास' करते तो इसका अस्तित्व "असम्प्रतिष्ठित" कैसे होता? इस पूरे श्लोक को स्वप्न और स्वप्नद्रष्टा के रूपक के माध्यम से एक हद तक समझा जा सकता है — कि कैसे एक अर्थ में न तो स्वप्न स्वप्नद्रष्टा "में" है, न स्वप्नद्रष्टा की आत्मा स्वप्न "में" स्थित होती है; लेकिन एक अन्य अर्थ में स्वप्नद्रष्टा में स्वप्न है, और स्वप्नद्रष्टा भी स्वप्न में है। इसी विरोधाभास को "चतुःश्लोकी भागवत" में इस प्रकार से व्याख्यायित किया गया है— अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत् परम् । पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥ १॥ ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि । तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ॥ २ ॥ यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु । प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ॥ ३ ॥ एतावदेव जिज्ञास्यंतत्त्व जिज्ञासुनाऽऽत्मनः । अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा ॥ ४॥ भावार्थ : सृष्टि के पूर्व केवल मैं-ही-मैं था, मुझसे भिन्न सत् और असत् कुछ भी नहीं था। सृष्टि के बाद भी मैं ही हूँ और जो कुछ (सृष्टि) यह है, वह भी मैं ही हूँ। (सृष्टि से परे जो कुछ शेष है या रहेगा, वह भी मैं ही हूँ। (1) जो कुछ अर्थ के बिना प्रतीत होता है और आत्मा में प्रतीत नहीं होता, उसे मेरी माया जानना चाहिए, जैसे आभास (प्रतिबिम्ब) और जैसे अंधकार। (2) जैसे महान् भूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) छोटे-बड़े भूतों में प्रविष्ट होते हुए भी वास्तव में उनमें अप्रविष्ट ही रहते हैं, वैसे ही मैं भी उनमें (सृष्टि में) रहता हुआ भी वास्तव में उनमें नहीं हूँ। (3) व्याख्या : जैसे प्राणियों के पंचभूत-रचित छोटे-बड़े शरीरों में आकाश आदि पंचमहाभूत उन शरीरों के कार्यरूप से निर्मित होने के कारण प्रवेश करते भी हैं और पहले से ही उन स्थानों और रूपों में कारणरूप से विद्यमान रहने के कारण प्रवेश नहीं भी करते, वैसे ही उन प्राणियों के शरीर की दृष्टि से मैं उनमें आत्मा के रूप से प्रवेश किये हुए हूँ और आत्मदृष्टिसे अपने अतिरिक्त और कोई वस्तु न होनेके कारण उनमें प्रविष्ट नहीं भी हूँ ॥ जो साधक तत्त्व को जानने की इच्छा करता है, उसके लिए केवल वही वस्तु जिज्ञासा का विषय है —जो अन्वय और व्यतिरेक की पद्धति से सिद्ध होकर हर समय और हर स्थान पर विद्यमान रहती है। (4) व्याख्या : तत्त्व-जिज्ञासा (Ultimate inquiry) : साधक को क्या जानना चाहिए? उत्तर है — केवल वही सत्य जो हर जगह, हर समय, और हर परिस्थिति में अविनाशी बना रहता है। अन्वय-व्यतिरेक (logic of concomitance & exclusion) : यह न्यायशास्त्र की पद्धति है — अन्वय = जहाँ-जहाँ कारण है, वहाँ-वहाँ परिणाम पाया जाए। व्यतिरेक = जहाँ-जहाँ कारण अनुपस्थित है, वहाँ-वहाँ परिणाम भी अनुपस्थित हो। इस प्रक्रिया से ही शाश्वत तत्त्व को चिन्हित किया जाता है। सर्वत्र, सर्वदा : कोई वस्तु यदि कहीं और कभी नहीं रहती, तो वह परम तत्त्व नहीं हो सकती। केवल वही तत्त्व है जो स्थान और काल की सीमाओं से परे सदैव एक समान रहता है। दार्शनिक संकेत : यहाँ संकेत परब्रह्म की ओर है — नश्वर पदार्थ (धन, शरीर, सुख आदि) हर समय और हर जगह नहीं रहते परम तत्त्व, जो भगवान / ब्रह्म है, वही सर्वत्र और सर्वदा विद्यमान है। इसलिए जिज्ञासु को उसी का अनुसंधान करना चाहिए। (भागवत पुराण, 2.9.32-35)
English
Recall the Lord’s statement that He dwells in the hearts of all living beings as their soul (10:20; 13:17; 15:15; 18:61)? There may appear to be a conflict between those verses and the current one. However, this contradiction is apparent, not real. He states that the world is not within Him, nor is His Self within the world. In what sense is He present in the world, and in what sense is He not? In what sense is the world within Him, and in what sense is it not? The Lord frequently presents such enigmatic scenarios to encourage readers to delve deeper into the magnificence and mystery of the Almighty Lord and to continuously reflect on solving this puzzle. This purpose is indeed fulfilled! At the outset of this chapter (9:2), the Lord Himself declared that what He was about to reveal was a profound mystery! The puzzle can be largely unraveled by comprehending the situation in the context of the relationship between the dream and the dreamer. In one sense, the dreamer exists within the dream, and the dream exists within the dreamer. However, in another sense, neither the dream is “within” the dreamer nor the dreamer is “within” the dream. The Lord has affirmed that He pervades the entire cosmos. Yet, there is a distinction between His “pervading” and His Self “dwelling” within the cosmos. It is essential to consider both the poetic and scientific connotations of these words.