Raja Vidya Raja Guhya Yoga
राजविद्या राजगुह्य योग
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना। मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥ 9:4॥
मया ततम् इदम् सर्वम् जगत् अ-व्यक्त-मूर्तिना; मत्-स्थानि सर्व भूतानि, न च अहम् तेषु अव-स्थितः।
मया अ-व्यक्त-मूर्तिना (मेरे अव्यक्त रूप से) इदम् (यह) सर्वम् (सारा) जगत् (संसार) ततम् (व्याप्त है) च (और) सर्व भूतानि (सभी कुछ) मत्-स्थानि (मेरे अन्तर्गत हैं) अहम् (मैं) तेषु (उनमें) न (नहीं) अव-स्थितः (स्थित हूँ)।
Hindi
मुझ अव्यक्त-मूर्ति {निराकार} परमात्मा से यह सब जगत परिपूर्ण है और सब भूत मेरे अंतर्गत स्थित हैं, मगर मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।
English
I pervade the entire cosmos through My Unmanifest Form, and all objects within the cosmos are in Me; yet I am not in them. (9:4)
Hindi
यहाँ 'मुझ' श्रीकृष्ण भी हैं और उन्हीं में एकत्र 'अव्यक्तमूर्ति' (निराकार) परमात्मा भी, जिससे यह स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण निराकार परमात्मा के ही साकार रूप हैं, और इसलिए ईश्वर साकार-निराकार दोनों रूपों में रह सकते हैं। यहाँ 'अवतारवाद' का कथन है। भगवद्-गीता में कई स्थलों पर यह स्पष्ट किया गया है कि व्यक्तमूर्ति श्रीकृष्ण परमेश्वर हैं। विश्वरूप-दर्शन उनमें से एक है। रामचरितमानस में इस विचार का प्रतिबिंब देखिए— सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा॥ (मानस, बालकाण्ड, 115:1) 'भूत' के कई अर्थ होते हैं — जैसे प्राणी या जीव, पाँच भौतिक तत्त्व (पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और आकाश), संसार आदि (आप्टे का शब्दकोश देखें)। अकसर भगवान भगवद् गीता में 'भूत' का प्रयोग प्राणियों के लिए किया करते हैं। मगर यहाँ के संदर्भ में, जिसमें इस श्लोक के प्रथम खंड में "जगत" शब्द का प्रयोग भी शामिल है, यह स्पष्ट है कि यहाँ 'भूत' का प्रयोग संसार और पंचभूतों के लिए ही हुआ है।
English
The projection on the screen in a movie theatre resides within the projector, yet the projector is not within the panoramic world displayed on the screen. Similarly, the phenomenal world or the cosmos is a projection originating from God. Both God and the cosmos exist, but their modes of existence are distinct, akin to a dream and the dreamer coexisting but with differing modes of existence. The dream lacks independent existence.