Raja Vidya Raja Guhya Yoga
राजविद्या राजगुह्य योग
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः।।9:34।।
मत्-मनाः भव, मत्-भक्तः, मत्-याजी, माम् नमः-कुरु; माम् एव एष्यसि, युक्त्वा एवम् आत्मानम्, मत्-परायणः।
मत्-मनाः (मुझमें मन वाला) भव (हो), मत्-भक्तः (मेरा भक्त), मत्-याजी (मेरा पूजक), माम् (मुझे) नमः-कुरु (नमस्कार करो); एवम् (इस प्रकार) आत्मानम् (आत्मा को), युक्त्वा (जोड़ कर) मत्-परायणः (मेरे परायण होकर) माम् (मुझे) एव (ही) एष्यसि (प्राप्त करोगे)।
Hindi
मुझमें तल्लीन मन वाले हो, मेरे भक्त बनो, मेरा अर्चन करो, मुझको नमन करो, और इस प्रकार आत्मा को मुझमें तन्मय करके मेरे पथगामी हुए तुम मुझको ही प्राप्त करोगे।
English
Have Me in mind; pour your heart's love and reverence upon Me; Me you worship, and Me you pay your homage to. Thus, having immersed your being into Mine and thus having unified yourself with Me, you shall assuredly come to Me. (9:34)