Raja Vidya Raja Guhya Yoga
राजविद्या राजगुह्य योग
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्।। 9:32।।
माम् हि पार्थ व्यपाश्रित्य ये अपि स्युः पाप-योनयः— स्त्रियः वैश्याः तथा शूद्राः ते अपि यान्ति पराम् गतिम्।
हि (निश्चय ही) पार्थ (पार्थ, अर्जुन) स्त्रियः (स्त्रियाँ), वैश्याः (वैश्य), शूद्राः (शूद्र), तथा (और) पाप-योनयः (पापयुक्त कूलों में जन्म लेने वाले) ये (जो) अपि (भी) स्युः (हों) ते (वे) अपि (भी) माम् (मेरे) व्यपाश्रित्य (आश्रित होकर) पराम् (उच्चतम) गतिम् (गति) यान्ति (प्राप्त करते हैं)।
Hindi
हे अर्जुन! जो मेरी शरण लेते हैं, वे चाहे पापयुक्त कुलों में उत्पन्न हों, अथवा स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र ही क्यों न हों—वे भी परम गति को प्राप्त होते हैं।
English
O Pārtha! {Regardless of their birth} Even individuals of sinful origins, women, those belonging to the mercantile class and farmers (Vaishyas), and manual and menial workers (Shudras) can attain the highest spiritual destination when they seek refuge in Me with wholehearted devotion. (9:32)
Hindi
स्त्रियों और शूद्रों को आध्यात्मिक समता प्रदान करने के मामले में अधिकांश पुराण भी वेदों से बहुत भिन्न नहीं हैं। अनेक पुराणों ने आध्यात्मिक दीक्षा की पात्रता केवल द्विजों तक ही सीमित रखी। वास्तव में आध्यात्मिक समता की मुख्य परीक्षा तब होती है जब औपचारिक आध्यात्मिक दीक्षा का प्रश्न उठता है। जो शिव स्वयं भूत-पिशाचों को भी अपना सहचर बना लेते हैं, उन्हीं शिव के पंथ में भी दीक्षा का अधिकार शिवमहापुराण ने केवल द्विजों तक सीमित कर दिया। शिवमहापुराण के उत्तर खंड की वायवीय संहिता के अध्याय 15 में यह कहा गया है कि केवल द्विजातियों को ही यथोचित रीति से शुद्ध कर तत्त्व का बोध कराया जाना चाहिए— “ऋजवो मृदवः स्वच्छा विनीताः स्थिरचेतसः। शौचाचारसमायुक्ताः शिवभक्ता द्विजातयः॥” (शिवपुराण, वायवीय संहिता, उत्तर खंड, अध्याय 15, श्लोक 60, गीता प्रेस) यही नहीं, इसमें यह भी कहा गया है कि शिव संस्कार-कर्म में द्विज-नारी का भी स्वतः अधिकार नहीं है। वह पिता या पति की आज्ञा से ही उक्त दीक्षा-संस्कार की अधिकारी हो सकती है— “नाधिकारः स्वतोनार्याः शिवसंस्कारकर्मणि। नियोगाद्धर्तुरस्त्येव भक्तियुक्ता यदीश्वरे॥” (वही, श्लोक 62) “तथैव भर्तृहीनाया पुत्रादेरभ्यनुज्ञया। अधिकारो भवत्येव कन्यायाः पितुराज्ञया। शूद्राणां मर्त्यजातीनां पतितानां विशेषतः॥” (वही, श्लोक 63) यहाँ तक कि विधवा द्विज-स्त्री भी बिना पुत्र आदि की अनुमति के शैव-दीक्षा ग्रहण नहीं कर सकती। शिवपुराण शूद्रों और वर्णसंकरों को षडध्वशोधन (शिव संस्कार-दीक्षा) की अनुमति नहीं देता। इसके विपरीत, भगवान श्रीकृष्ण ने बिना किसी किंतु-परंतु के स्त्रियों और शूद्रों—दोनों को अध्यात्म और ईश्वर-प्राप्ति में समानता का दर्जा प्रदान किया। केवल शिवपुराण ही नहीं, बल्कि सर्वश्रेष्ठ माने जाने वाला भागवत पुराण भी कहीं-कहीं अत्यंत उदारता प्रदर्शित करता है, किंतु कहीं किसी-न-किसी प्रसंग में शूद्रों को अलग कर ही देता है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है— “इस प्रकार गुरुकुल में निवास करके द्विजातीयों को अपनी शक्ति और आवश्यकता के अनुसार वेद और उनके अंग—शिक्षा, कल्प आदि—और उपनिषदों का अध्ययन तथा ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।” (भागवत पुराण, स्कंध 7, अध्याय 12, श्लोक 13) यह कथन स्वयं नारदजी के मुख से कहा गया है, जिसमें केवल द्विजातियों द्वारा गुरुकुल में अध्ययन करने का उल्लेख है। अर्थात सनातन धर्म के अधिकांश ग्रंथों में यह वैदिक परंपरा बनी रही। भागवत पुराण के वर्तमान संस्करणों में इतना अंतर्विरोध है कि संभव है बाद के विप्रवादी आचार्यों ने इसमें मिलावट कर दी हो। यह तो केवल भगवद् गीता और उस पर आधारित ‘भगवद्धर्म’ ही है, जिसमें शूद्रों और स्त्रियों के साथ कोई भेदभाव नहीं किया गया। भागवत पुराण द्वारा प्रसारित ‘भागवतधर्म’ में भी वेदों पर आधारित जन्मना वर्ण-व्यवस्था और भेदभाव अंततः बच ही गया है। शूद्रों को भगवान से और उनके मंदिरों से अलग रखने का कुचक्र बहुत पुराना है। लेकिन यह मनुष्यों का कुचक्र है, ईश्वर का नहीं। मध्यकाल में जाति से ग़रेड़िया शूद्र कनकदास कर्नाटक के उडुपी में भगवान विट्ठल (श्रीकृष्ण) के अनन्य भक्त हुआ करते थे। मगर शूद्र होने के कारण उन्हें मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं थी। अतः वे मंदिर की खिड़की के बाहर से ही प्रभु की आराधना करते थे। कनकदास बड़े प्रेमाकुल भक्त थे। कहा जाता है, एक दिन उनके प्रेम से विह्वल होकर भगवान विट्ठल ने खिड़की की ओर से ही उनकी ओर मुख कर लिया। आज भी उस मंदिर में विट्ठल की मूर्ति खिड़की की ओर ही उन्मुख है। “पापयोनि” वास्तव में पशु-पक्षी आदि योनियों को कहा गया है। जैसे—गरुड़ या काकभुशुंडि पक्षी-शरीर में उत्पन्न हुए थे, फिर भी मुक्ति-कामी थे। मनुष्य का जन्म पापकर्मियों को नहीं मिलता, बल्कि वह उच्चतर कर्मफल के आधार पर प्राप्त होता है। यह श्लोक (गीता 9.32) अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, और उस समय की दृष्टि से वास्तव में एक क्रांतिकारी कथन है। गीतारहस्य में लोकमान्य तिलक लिखते हैं: “ज्ञानमार्ग में एक और भी अड़चन है। जैमिनी की मीमांसा, और उपनिषद या वेदान्त-सूत्रों को देखें, तो मालूम होगा कि उनमें… अंत में निर्णय किया गया है कि स्वर्ग-प्राप्ति के साधनभूत श्रौत यज्ञ-यागादिक कर्म करने का, अथवा मोक्ष-प्राप्ति के लिए आवश्यक उपनिषद आदि वेदाध्ययन करने का अधिकार भी पहले तीन वर्णों के पुरुषों को ही है।” (वेदान्त-सूत्र 1.3:34-38 — गीतारहस्य, तेरहवाँ प्रकरण, भक्ति मार्ग, पृ. 439) भागवतपुराण भी स्वीकार करता है कि वेद-श्रवण का अधिकार शूद्रों, स्त्रियों और पतित द्विजातियों को नहीं था। इसीलिए व्यासदेव ने महाभारत की रचना की—जिसमें गीता सम्मिलित है—ताकि वे भी धर्म और अध्यात्म का मार्ग पा सकें। (भागवतपुराण, प्रथम स्कंध, अध्याय 4, श्लोक 25) स्पष्ट है कि शूद्रों और स्त्रियों को वेदवादियों ने वेदों-उपनिषदों के अध्ययन-श्रवण आदि से रोककर स्वर्ग और मोक्ष—दोनों से वंचित कर दिया था। लोग अक्सर इस पर उपहास करते हैं कि इस्लाम में हदीस (सहीह बुखारी, खंड 4, किताब 54, संख्या 464) में वर्णन मिलता है कि जब पैगंबर मुहम्मद नरक के दर्शन के लिए ले जाए गए, तो उन्हें वहाँ अधिकांश स्त्रियाँ दिखीं। लेकिन प्रश्न यह है कि वैदिक धर्म में स्थिति क्या बहुत बेहतर थी? यदि स्त्रियों के स्वर्ग और मोक्ष के मार्ग ही बंद कर दिए जाएँ, तो वे मृत्यु के बाद कहाँ जाएँगी? स्त्रियों के विषय में प्रतिकूल टीका-टिप्पणी करना अधिकांश सनातनी ग्रंथों की आदत रही है। भागवत पुराण जैसे उदात्त ग्रंथ में भी कश्यप ऋषि के मुख से कठोर स्त्री-निंदा कराई गई है, जिसे छठे स्कंध के अठारहवें अध्याय के श्लोक 41–42 में देखा जा सकता है। किन्तु भगवद् गीता में स्त्री-निंदा का लेशमात्र भी नहीं है। निश्चय ही स्त्री-स्वभाव और पुरुष-स्वभाव की अलग-अलग त्रुटियाँ होती हैं, जिन्हें उनके कल्याण के लिए इंगित किया जा सकता है। किंतु ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि धर्मग्रंथ प्रायः पुरुष-स्वभाव की त्रुटियों को अलग से चिह्नित नहीं करते, जबकि स्त्री-स्वभाव की त्रुटियाँ उन्हें तुरंत दिखाई पड़ जाती हैं। स्त्रियों की स्थिति का जो चित्र बाइबिल, कुरान और हदीसों में मिलता है, उसकी आलोचना अनेक स्तरों पर होती रहती है। इसीलिए कई ईसाई और इस्लामी विद्वान गीता के इस श्लोक (9.32) को उद्धृत करते हुए कहते हैं कि इसमें स्त्रियों को "पापयोनि" कहा गया है—जो आपत्तिजनक है। किंतु यह स्पष्ट करना अत्यावश्यक है कि इस श्लोक में स्त्रियों को "पापयोनि" नहीं कहा गया है। श्लोक का अन्वय इस श्लोक (9.32) की संरचना व्याकरण की दृष्टि से दो खंडों में है— येऽपि स्युः पापयोनयः = जो पाप-योनियों (पापयुक्त कुलों) में उत्पन्न हुए हों। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्राः = स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र। इन दोनों को जोड़कर कहा गया है— “तेऽपि परां गतिं यान्ति” = वे भी परम गति को प्राप्त होते हैं। निष्कर्ष अर्थात् भगवान ने चार श्रेणियाँ गिनाई हैं— पाप-योनि में उत्पन्न लोग स्त्रियाँ वैश्य शूद्र फिर यह स्पष्ट किया कि भक्ति के द्वार सबके लिए खुले हैं। श्लोक की संरचना (syntax) से यह बिल्कुल स्पष्ट है कि स्त्रियाँ और पापयोनि एक-दूसरे के पर्याय नहीं बनाए गए हैं। “येऽपि स्युः पापयोनयः” एक अलग वाक्यांश है। “स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्राः” दूसरा अलग वाक्यांश है। इसलिए यह निष्कर्ष किसी भी प्रकार के अन्वय से नहीं निकाला जा सकता कि भगवान ने स्त्रियों को पापयोनि कहा है।। भगवान का वास्तविक संदेश भगवान अर्जुन से कह रहे हैं— “हे पार्थ! चाहे कोई पापयोनि में जन्मा हो, या फिर समाज की दृष्टि से सीमित अधिकारों वाला (स्त्री, वैश्य, शूद्र) ही क्यों न हो—यदि वह मेरी शरण ले, तो परम गति प्राप्त कर सकता है।” अर्थात् गीता यहाँ समाज-निर्मित सीमाओं को तोड़ रही है, न कि स्त्रियों का अवमूल्यन कर रही है। यह श्लोक स्त्रियों को पापयोनि कहने का कोई संकेत नहीं देता। उल्टा, यह भगवान का समावेशी संदेश है— “मेरा दरवाज़ा सबके लिए खुला है, चाहे वह किसी भी जन्म, स्थिति या परिस्थिति में क्यों न हो।” संवैधानिक समानता और गीता का सन्देश भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(3) और 15(4) को मिलाकर देखें तो हमें यह अधिनियम-वाक्य मिलता है— "राज्य स्त्रियों और अनुसूचित जातियों (और पिछड़े वर्गों) दोनों के लिए विशेष प्रावधान कर सकता है।" अर्थात संविधान एक ही सिद्धांत में स्त्रियों और शूद्रों (अनुसूचित जाति/जनजाति) दोनों की स्थिति को न्याय और समान अवसर के अधिकार से जोड़ता है। यह उनको एक ही समूह या पर्याय मानने का दृष्टिकोण नहीं है, बल्कि दोनों के अधिकार-संरक्षण का संवैधानिक समर्थन है। गीता के इस श्लोक के संदर्भ में भी यही बात लागू होती है। वैदिक परंपरा में वेदाध्ययन और आध्यात्मिक ज्ञान की पात्रता को लेकर स्त्रियों और शूद्रों को एक श्रेणी में रखा गया था। इसी कारण भगवान ने उन्हें उसी श्रेणी में रखकर यह उद्घोष किया कि— अब उन सीमाओं का अंत हो चुका है; भक्ति और मोक्ष के द्वार सभी के लिए समान रूप से खुले हैं। एक और महत्वपूर्ण तथ्य ध्यान देने योग्य है कि भगवान ने इस श्लोक में स्त्रियों के साथ केवल शूद्रों को ही नहीं रखा, बल्कि वैश्य—जो स्वयं द्विजाति का एक वर्ग है—को भी शामिल किया। यह स्पष्ट संकेत है कि यहाँ उद्देश्य किसी का अवमूल्यन नहीं, बल्कि समावेशन और समान अवसर का उद्घोष है। भगवान के स्त्रियों के प्रति भाव भगवान के स्त्रियों के प्रति वास्तविक भाव को गीता के ही एक अन्य श्लोक में देखा जा सकता है— श्लोक 10.34 में वे स्वयं कहते हैं: “स्त्रीत्व में मैं कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ।” यहाँ भगवान ने स्त्रीत्व के माध्यम से मानवीय जीवन की सबसे श्रेष्ठ और आवश्यक दिव्य गुणनिधियों की अभिव्यक्ति बताई है। इससे स्पष्ट है कि गीता के श्लोक 9.32 को स्त्री-निंदा या "पापयोनि" कहने से जोड़ना न तो व्याकरण की दृष्टि से उचित है और न ही भगवान के भाव के अनुकूल।।
English
The mainstream Hindu Faith, often referred to as Varnāshrama Dharma, has deep roots in the Vedas and Vedic scriptures. Within this framework, the lowest stratum of society, the Shudras—many of whom were unjustly labeled as "untouchables"—faced systematic exclusion and subjugation. They were denied access to Vedic study, participation in yajnas (sacrificial fire-ceremonies), and the acquisition of spiritual knowledge. Even the revered Vedānta Sutra, a sacred text of Varnāshrama Dharma, endorsed such discriminatory practices (Vedānta Sutra 1.3:34-38), and not only the Manusmriti. Moreover, they were barred from entering temples. Women also faced many such deprivations. In this context, Bhagawān Krishna’s stance in this verse represented a revolutionary departure from the norms of the Vedic religion, signaling a shift toward a more equitable and inclusive Faith—the Bhagavad-Dharma. The historical conspiracy to exclude Shudras from temple access was indeed long-standing, but it was a creation of human prejudice, not the will of God. An illustrative account from medieval times involves a devoted Shudra shepherd named Kanaka Das in Udupi, Karnataka, who worshiped Lord Vitthal (Bhagawān Krishna). Due to his Shudra status, Brāhmin priests denied him entry to the temple. Undeterred, Kanaka Das paid his obeisance to Bhagawān Krishna by standing outside the temple window. It is said that, moved by Kanaka Das’s deep love and devotion, the Lord’s idol turned toward the window where Kanaka Das stood. This act of divine acknowledgment persists today, as the statue continues to face the window rather than the main entrance door.