9:26श्रीभगवानुवाच

Raja Vidya Raja Guhya Yoga

राजविद्या राजगुह्य योग

Sanskrit Shloka

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।। 9:26।।

Padacheeda (Word-by-Word)

पत्रम्, पुष्पम्, फलम्, तोयम् , यः मे भक्त्या प्र-यच्छति, तत् अहम् भक्त्या-उप-हृतम् अश्नामि प्रयत-आत्मनः।

Anvaya (Construction)

यः (जो) मे (मुझे) भक्त्या (भक्ति से) पत्रम् (पत्ते), पुष्पम् (फूल), फलम् (फल), तोयम् (पानी) प्र-यच्छति (अर्पित करता है), प्रयत-आत्मनः (शुद्ध-बुद्धि का) भक्त्या-उप-हृतम् (भक्ति से अर्पित किया हुआ) तत् (वह) अहम् (मैं) अश्नामि (खाता हूँ)।

Meaning

Hindi

जो मेरे लिए प्रेम-भक्तिपूर्वक पत्ते, फूल, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस भक्त का प्रेम-पूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र-पुष्प-फल आदि मैं खाता हूँ।


English

Whosoever offers to me with love and devotion a leaf, a flower, a fruit, or water, I accept that offering of love made by those of a pure heart. (9:26)

Commentary

Hindi

भक्ति-मार्ग में भावना का महत्त्व है, पूजन-सामग्री का नहीं। तुलसी का एक पत्ता भी काफी है, जल ही पर्याप्त है! वह भी न हो तो मानसिक पूजा ही पर्याप्त है, सिर्फ भावना की उत्कटता चाहिए। यहाँ वैदिक पूजा-प्रणाली पर भगवान ने फिर निशाना साधा है, जिन वैदिक यज्ञों और हवन में प्रचुर सामग्री लगती है, अतिरिक्त उद्यम लगता है, जो निर्धन के वश के बाहर की चीज हैं। विशेष अवसरों पर किए जाने वाले विशाल अग्नि यज्ञों का तो कहना ही क्या, वैदिक जीवन व्यवस्था में प्रतिदिन दो सन्ध्याएँ करने की बात है, जिनमें न केवल गायत्री का जप और ऋषियों, देवताओं तथा पितरों के तर्पण का विधान है, बल्कि दोनों शाम अग्निहोत्र यानी अग्नियज्ञ का भी नियम है। मनुस्मृति का यह कथन देखिए— "दूरस्थल (जंगल) से समिधा ला कर उन्हें खुले स्थान में सूखने के लिए रख दें। फिर उनसे आलस्य रहित होकर सायं काल और प्रातः काल दोनों समय अग्निहोत्र करें।" ^8 हवन करने में प्रत्येक बार घृत और अन्य हवन सामग्री भी लगती है। कुछ पुराणों ने इस प्रथा की अनिवार्यता समाप्त की, मगर कुछ ने इसमें ढील देते हुए इसे बनाये भी रखा। उदाहरण के लिए शिवपुराण ने यह कहा कि अगर दो समय हवन करने की सामर्थ्य नहीं है तो एक बार कर के भी काम चलाया जा सकता है। दूसरी संध्या जप और तर्पण से ही पूरी जा सकती है। यानी आधा खर्च अभी भी करना आवश्यक था। भगवान ने धर्म, उपासना और अध्यात्म को सर्व सुलभ बनाने के लिए "पत्रं पुष्पं फलं तोयं" को भक्तिपूर्वक, भावपूर्वक समर्पित करने की बात कही, जिसमें कोई घृत नहीं लगता, धन नहीं लगता, सिर्फ़ भक्तिभाव लगता है। उन्होंने ने तो दो बार संध्या करने को कहा न अग्निहोत्र करने की बात कहीं। इस श्लोक को मूर्ति-पूजा की प्रथा का भी बीज माना जाता है, क्योंकि इसमें भगवान ने फल, जल आदि को 'खाने' की बात भी की है। यों भगवान के तो मुख हर जगह हैं—तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् (13:13)—इसलिए बिना मूर्ति की उपस्थिति के, सिर्फ भावना करने से ही, वे उन्हें अर्पित किए गए फल-फूल और अन्य भोज्य पदार्थ 'खा' सकते हैं। इसीलिए, न केवल मंदिर में भगवान के विग्रह की उपस्थति में, बल्कि बाहर भी, कहीं भी, भोजन ग्रहण करते वक्त भगवान को अपना भोजन भक्तिपूर्वक अर्पित करके खाना उचित है। खर्चीले अनुष्ठानों वाली पौराणिक पूजा, या वैदिक अग्नियज्ञ दोनों ही ईश्वर से ग़रीब और सर्वसाधारण की दूरी बना देते हैं, और ईश्वर उपासना को अमीरों का उपक्रम बना देते हैं। यही नहीं ये भ्रष्टाचार और पाखंड को भी बढ़ावा देते हैं। यहाँ तक कि कुछ वैदिक धर्मग्रंथों में तो यज्ञ पूर्ण करने के लिए बलात छीन कर या चोरी करके धन लाना भी अधर्म नहीं माना गया है।। जब भी भगवान को कुछ अर्पित करना हो, भावपूर्णता के साथ करना चाहिए। भाव निर्मित करने के लिए इस तरीके का भी प्रयोग कर सकते हैं : आँखें मूँद कर वैकुंठ में नारायण के दर्शन कीजिए। वैकुंठ की कल्पना करने के लिए श्लोक 15:6 की टिप्पणी में वैकुंठ का वर्णन देखिए। वहाँ भगवान नारायण को उनके सिंहासन पर देखिए और पुष्प आदि उपहार उनके चरणों में अर्पित कीजिए और आहार या पेय उनके मुख में। प्रयोग करके देखिए। निश्चय ही आपके अंदर भक्ति भाव संचारित होगा। और यही भाव प्रभु को अभीष्ट है। मूर्ति पूजा की विधि जो भक्त मूर्ति पूजा करना चाहते हैं, वे भागवत पुराण में श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए इन कुछ निर्देशों का अनुसरण कर सकते हैं, किंतु बहुत अधिक विधि विधान बनाना या अधिक खर्चीले अनुष्ठान करना भगवद् गीता में दिए गए प्रभु के निर्देशों के विरुद्ध है— "मेरी मूर्ति आठ प्रकार की होती है - पत्थर की, लकड़ी की, धातु की, मिट्टी औरचंडाल आदि की, चित्रमयी, बालुकामयी, मनोमयी और मणिमयी। चल और अचल भेद से दो प्रकार की प्रतिमा ही मुझ भगवान का मंदिर है। उद्धव जी, अचल प्रतिमा के पूजन में, प्रतिदिन आवाहन और विसर्जन नहीं करना चाहिए। चल प्रतिमा के संबंध में विकल्प है। चाहे करे और चाहे ना करे। परंतु बालुकामयी प्रतिमा में तो आवाहन और विसर्जन तो प्रति दिन करना ही चाहिए।मिट्टी और चंदन तथा चित्रमयी प्रतिमाओं को स्नान ना करावें, केवल मार्फ़ज़ान कार दें, परंतु और सब को स्नान कराना चाहिए। प्रसिद्ध प्रसिद्ध पदार्थों से प्रतिमा आदि में मेरी पूजा की जाती है। परंतु जो निष्काम भक्त हैं, वे अनायास प्राप्त पदार्थों से और भावनामात्र से ही हृदय में मेरी पूजा कर लें।"^9 मूर्तिपूजको के लिए सावधानी मूर्तिपूजा यों तो सगुण ईश्वर की उपासना का एक सरल और सर्व-सुलभ साधन है मगर मूर्तिपूजक कुछ आनिवार्य बातें भूल जाने के कारण अकसर अधिक आध्यात्मिक प्रगति नहीं कर पाते। भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में एक पवित्र अवसर पर एकत्र हुए महान ऋषियों व्यास, नारद, च्यवन, परशुराम, वशिष्ठ, भृगु, पुलस्त्य, कश्यप, अत्रि, मार्कंडेय, बृहस्पति, अंगिरा, अगस्त्य, याज्ञवल्क्य, सनत्कुमार आदि की सभा में उन्हें संबोधित करते हुए सबों को यह ज्ञान दिया कि व्यक्ति को केवल मूर्ति में अपने इष्टदेव परमेश्वर को नहीं देखना चाहिए बल्कि सभी जीवों में देखना चाहिए।^10 पवित्र भागवत महापुराण में ही भगवान नारायण के अंशावतार कपिल मुनि ने और विस्तार से बतलाते हुए यह कहा है कि मैं आत्मा-रूप से सभी जीवों में विद्यमान हूँ। इसलिए, जो लोग मुझ सर्वभूतस्थित परमात्मा का अनादर करके सिर्फ प्रतिमा में ही मेरा पूजन करते हैं, उनकी वह पूजा स्वांग-मात्र है। सभी प्राणियों में मैं परमेश्वर उनकी आत्मा के रूप में स्थित हूँ। ऐसी दशा में जो अज्ञानवश मेरी उपेक्षा करके केवल मूर्ति के पूजन में ही लगा रहता है, वह मानव तो भस्म में ही हवन कर रहा होता है। जो दूसरे जीवों का अपमान करता है, वह बहुत-सी सामग्रियों से अनेक प्रकार के विधि-विधान के साथ मेरी मूर्ति का पूजन भी करे, तो भी मैं उससे प्रसन्न नहीं हो सकता। अतः संपूर्ण प्राणियों के भीतर घर बना कर उन प्राणियों के रूप में स्थित परमात्मा का यथायोग्य दान, मान, मित्रता के व्यवहार तथा समदृष्टि के द्वारा पूजन करना चाहिए"।^11


English

The verse subtly alludes to the Vedic sacrificial rituals, which often required expensive materials like purified butter for oblations. Here, God indirectly conveys that there’s no need for such costly rituals, often challenging for the less affluent. Instead, God finds joy in offerings of leaves, fruits, or even plain water, as long as the offering is made with a pure heart. The essence lies not in the material offered but in the depth of love and devotion behind it. Simple prayers, filled with faith and reverence, suffice even in arid regions where water and leaves are scarce. This verse also lays the foundation for the practice of idol worship. The term "ashnami," meaning "I eat," implies that God "consumes" offerings of leaves and fruits. Hence, idols are offered edibles, symbolizing the subtle essence consumed by God. The Lord can accept such offerings even when made at a dining table, as later in verse 13:13, He asserts His omnipresence, with His mouth, eyes, and ears everywhere. Offering food to Him with love and reverence, He "eats" it, irrespective of whether His idol is physically present. However, while idolatry offers a straightforward way to worship God, adherents must not overlook essential aspects of idol worship. In a rare gathering of great sages, Sri Krishna emphasized that a devotee should not merely see their favorite deity within the idol but recognize the divine presence in all living beings (Verse 10, 13, Ch. 84, Tenth Skandha, Bhāgawata Purāna). Kapil Muni, a great sage and an incarnation of Lord Nārāyana, further elaborated on this concept, asserting that God resides within all living beings as their soul. Therefore, worshiping God solely through the idol, while disrespecting the divine within others, amounts to hypocrisy. True devotion involves recognizing and honoring the divine presence in others through acts of charity, respect, and compassionate interactions (Verse 21-27, Ch.29, Third Skandha, Bhāgawata Purāna).

Footnotes

^8 दूरदाहृत्य समिधः सन्निदध्याद्विहायसि।सायं प्रातश्च जुहुयात्ताभिः अग्निमतन्द्रितः॥ मनुस्मृति, अध्याय 2, श्लोक 161 ^9 भागवत महापुराण, स्कंध 11, अध्याय 27, श्लोक 12-15 ^10 श्लोक 10, 13, अ. 84, दशम स्कंध, भा.पु. ^11 श्लोक 21-27, अ.29, तृतीय स्कंध, भा.पु.