9:25श्रीभगवानुवाच

Raja Vidya Raja Guhya Yoga

राजविद्या राजगुह्य योग

Sanskrit Shloka

यान्ति देवव्रता देवान् पितृृन्यान्ति पितृव्रताः। भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्।। 9:25।।

Padacheeda (Word-by-Word)

यान्ति देव-व्रताः देवान्, पितृन् यान्ति पितृ-व्रताः, भूतानि यान्ति भूत-इज्याः, यान्ति मत्-याजिनः अपि माम्।

Anvaya (Construction)

देव-व्रताः (देवों के भक्त) देवान् (देवताओं को) यान्ति (प्राप्त करते हैं), पितृ-व्रताः (पितरों के भक्त) पितृन् (पितरों को) यान्ति (प्राप्त होते हैं), भूत-इज्याः (भूतों के पूजक) भूतानि (भूतों को) यान्ति (प्राप्त होते हैं), मत्-याजिनः (मेरे पूजक) माम् (मुझे) अपि (ही) यान्ति (प्राप्त करते हैं)।

Meaning

Hindi

देवताओं को पूजने वाले मृत्यु के बाद देवताओं के लोक जाते हैं, पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूत-पिशाचों को पूजने वाले भूत-पिशाचों के बीच जन्म लेते हैं, और मेरा पूजन करने वाले भक्त मेरे धाम को प्राप्त होते हैं, मेरे लोक आते हैं। {इसीलिए मुझ परमेश्वर के उपासकों का पुनर्जन्म नहीं होता}।


English

Those who worship {subordinate} gods go to them after death; those who worship the ancestors go to the ancestors; those who offer sacrifices to ghosts and spirits, are born among them; but those who worship Me {and Me alone}, come to Me {and therefore do not come back to this world}. (9:25)

Commentary

Hindi

भूत और पिशाच की गणना अलग योनि में की जाती है। इन योनियों में भी जन्म लिया जा सकता है। निश्चय ही इन्हें श्रेष्ठ योनि या species नहीं कहेंगे। पितरों को प्राप्त होने का मतलब क्या हुआ? क्या पितरों के भी कोई अलग लोक होते हैं, जहाँ हमें मृत्यु के बाद जाना होगा, यदि हम पितरों की पूजा करेंगे? कुछ पितर तो स्वर्ग, कुछ नरक चले गए होंगे, और कुछ पुनर्जन्म को प्राप्त हो चुके होंगे! क्या हम पितरों की पूजा, श्राद्ध आदि बंद कर दें? यहाँ “पितर” का अर्थ केवल मनुष्य के शरीरधारी पूर्वज नहीं, बल्कि पूर्वज चेतनाएँ भी हैं, जिन्होंने — मानव सभ्यता की नींव रखी, धर्म–कर्तव्यों की शिक्षा दी, और मृत्यु के पश्चात जीवन की अवधारणा को आकार दिया। अर्यमा और यम — इन चेतनाओं के दैविक प्रतीक हैं। वास्तव में, ये दैवी पितर देवताओं की भाँति एक वर्ग हैं जो हमारे अपने पिता, पितामह, प्रपितामह आदि से भिन्न हैं। अर्यमा और यम की गणना भी इस वर्ग के पितरों में होती है। शास्त्र पितृलोक को भूलोक और स्वर्गलोक के बीच स्थित मानते हैं। कुछ शास्त्र यमलोक को ही पितृलोक मानते हैं। इस श्लोक में संभवतः ईश्वर का अभिप्राय इन दैविक पितरों की पूजा से है। भगवान ने पितरों के बीच अर्यमा का उल्लेख भी गीता में अलग से किया है — “अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् । पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥” (गीता, 10:29) मनुस्मृति के तीसरे अध्याय के श्लोक 194–202 के बीच देवों, राक्षसों, मनुष्यों आदि के अलग–अलग पितर बताए गए हैं।