Raja Vidya Raja Guhya Yoga
राजविद्या राजगुह्य योग
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्। हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥ 9:10॥
मया अध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते स-चर-अचरम्, हेतुना अनेन, कौन्तेय, जगत् वि-परिवर्तते।
कौन्तेय (हे कुंतिपुत्र अर्जुन)! मया (मेरे) अध्यक्षेण (निर्देशन में) प्रकृतिः (प्रकृति) स-चर-अचरम् (चल और अचल को) सूयते (उत्पन्न करती है), अनेन (इस) हेतुना (के कारण) जगत् (संसार) वि-परिवर्तते (चलता रहता है)।
Hindi
हे अर्जुन! मेरी अध्यक्षता में प्रकृति चर-अचर-सहित सारे जगत को रचती है, और इस कारण से ही यह संसार-चक्र घूम रहा है।
English
Under my guidance, Nature gives rise to all living beings and inanimate objects, O Son of Kunti! In this manner, the world continues to revolve through alternating cycles of Creation and Dissolution. (9:10)
Hindi
ब्रह्मांडसृष्टि-विज्ञान की चर्चा भगवद् गीता में संक्षेप में की गई है, क्योंकि यह युद्धभूमि में हुआ संवाद था। भागवत पुराण में सृष्टि-विज्ञान की थोड़ी लंबी चर्चा अलग-अलग स्थलों पर हुई है, जिससे सृष्टि-प्रक्रिया और क्रम पर अधिक विस्तृत प्रकाश पड़ता है। भागवत पुराण से ऐसा प्रतीत होगा कि परमेश्वर ने अव्यक्त प्रकृति में, या सम अवस्था में विद्यमान उसके गुणों में, क्षोभ उत्पन्न कर दिया जिससे सृष्टि-प्रक्रिया की शुरुआत हुई। इससे महत्तत्त्व, अहंकार, पंचमहाभूत, पंचतन्मात्राओं आदि की उत्पत्ति हुई। आगे विराट पुरुष के रूप में स्वयं परमेश्वर प्रकट हुए, जिन्होंने ब्रह्मा को अपने नाभि–कमल से प्रकट किया, और ब्रह्मा को अव्यक्त प्रकृति द्वारा प्रदत्त उपादानों से जगत और प्राणियों के निर्माण की रचना की ज़िम्मेवारी सौंपी। फिर ब्रह्मा ने पहले अपने मन के संकल्प–मात्र से मनु–शतरूपा आदि कुछ मानवीय जोड़ों की मानसी सृष्टि की। उसके बाद पुरुष–स्त्री समागम से उन प्राणियों और उनके वंशजों ने मैथुनी सृष्टि की शुरुआत की। ब्रह्मा को इसकी प्रेरणा और शक्ति परमेश्वर ने ही दी, और वे उनकी इसमें प्रत्यक्ष मदद भी आवश्यकतानुसार करते रहे। ब्रह्मा द्वारा रचित सारे जीवों में परमेश्वर ही चेतन आत्मा के रूप में संनिविष्ट हुए। इस श्लोक के संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि इस अर्थ में, उनकी अध्यक्षता में प्रकृति ने यह सृष्टि — या जगत के उपादानों की सृष्टि — की। प्रकृति के ही तीन गुणों से ब्रह्मा और अन्य प्राणियों के शरीर तथा जगत की अन्य सभी वस्तुओं का निर्माण हो सका। रामचरितमानस में महाज्ञानी मुनि वाल्मीकि, श्रीकृष्ण के पिछले अवतार श्रीराम से यही कहते हैं —“श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी। जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की॥” (मानस, अयो. 125:5)इसमें भगवद् गीता के श्लोक का प्रतिबिंब देखा जा सकता है।
English
In the Rām-charit-mānas, the poet-sage Tulasidāsa articulates the same principle as found in the Bhagavad-Gitā: "O Rāma, the Lord of the Universe! It is under Your guidance that Your Consort Sitā—representing Nature or Your Power of Creation, Māyā—creates, sustains, and eventually dissolves the universe."—Sruti Setu Pālak Ram tumh Jagadish, Māya Jānaki. Jo srijati jagu pālati harati rukh pāyi Kripānidhān ki.^1
^1 श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी। जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की॥ (125:5, Ayodhyā Kānda, Rāma-charita-mānasa)