Akshara Brahma Yoga
अक्षर ब्रह्म योग
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्। यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥ 8:5॥
अन्त-काले च माम् एव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम्यः प्र-याति— सः मत्-भावम् याति, न अस्ति अत्र संशयः।
यः (जो) अन्त-काले (अंत समय में) च (भी) माम् (मुझे) एव (ही) स्मरन् (स्मरण करते हुए) कलेवरम् (शरीर) मुक्त्वा (त्यागकर) प्र-याति (गमन करता है) सः (वह) मत्-भावम् (मेरा स्वरूप) याति (प्राप्त करता है) अत्र (इसमें) संशयः (संदेह) न (नहीं) अस्ति (है)।
Hindi
जो मनुष्य अंत-काल में भी मुझको ही याद करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे भाव को, अर्थात मुझे ही प्राप्त करता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है।
English
There is no doubt that he who proceeds on an onward journey leaving the body, with Me and Me alone in his mind in the final moments of life, attains the state of My Being. (8:5)