Jnana Karma Sannyasa Yoga
ज्ञान कर्म संन्यास योग
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥ 4:39॥
श्रद्धा-वान् लभते ज्ञानम्, तत्परः, संयत-इन्द्रियः, ज्ञानम् लब्धवा पराम् शान्तिम् अ-चिरेण अधि-गच्छति।
संयत-इन्द्रियः (जिसने अपनी इंद्रियों को संयमित किया है) तत्परः (लगनशील है) श्रद्धा-वान् (श्रद्धा से युक्त है) ज्ञानम् (ज्ञान को) लभते (प्राप्त करता है) ज्ञानम् (ज्ञान को) लब्धवा (प्राप्त करके) अ-चिरेण (थोड़े ही समय में) पराम् (परम) शान्तिम् (शांति को) अधि-गच्छति (प्राप्त कर लेता है)।
Hindi
जिसने इंद्रियों को वश में कर लिया है, जो निरंतर लगा हुआ है, तत्पर है, और जो श्रद्धावान है, वह निश्चय ही {आध्यात्मिक} ज्ञान प्राप्त कर लेता है, तथा उस ज्ञान को प्राप्त करने से जल्द ही उसे परम शांति उपलब्ध हो जाती है।
English
Spiritual Knowledge and enlightenment are attained by the one who has faith and reverence, makes unceasing efforts, and keeps one's senses under control. Such a one soon finds supreme peace and serenity after spiritual enlightenment dawns upon them. (4:39)
Hindi
स्कूलों और कॉलेजों में कुछ शिक्षक इस श्लोक का बड़ा दुरुपयोग करते पाए जाते हैं। जो विद्यार्थी प्रश्न उठाते हैं, उन्हें वे अश्रद्दावान घोषित कर चुप करा देते हैं—यह कहकर कि शिक्षकों से अधिक सवाल पूछना या बड़े आचार्यों पर प्रश्न उठाना अश्रद्धा है, और अश्रद्धालुओं को ज्ञान नहीं मिलता। यह तब है जबकि भगवान ने इसी अध्याय के 34वें श्लोक में आध्यात्मिक गुरुओं और धर्माचार्यों से न केवल प्रश्न करने, बल्कि परिप्रश्न—अर्थात चारों ओर से, गंभीरता और विनय के साथ प्रश्न पूछने—को आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति का आवश्यक साधन बताया है। भगवान ने श्रद्धा को निस्संदेह आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति के लिए—जो इंद्रियों से परे है—एक आवश्यक तत्त्व माना है। गीता के 17.28 में तो उन्होंने श्रद्धा को अध्यात्म का केंद्रीय तत्त्व ही घोषित कर दिया है। किन्तु जो ज्ञान इंद्रियगम्य है—अर्थात वैज्ञानिक ज्ञान—उसके लिए श्रद्धा या अश्रद्धा दोनों से परे हो कर सत्यान्वेषण की निष्ठा से बढ़ना होता है। श्रद्धा और अश्रद्धा—दोनों ही भावनाएँ कभी-कभी सत्य पर पर्दा डाल सकती हैं। एक समय बड़े वैज्ञानिक यह कह रहे थे कि कोई भी धातु-निर्मित भारी वस्तु हवा में तैर नहीं सकती। यदि अन्य वैज्ञानिक उनके प्रति श्रद्धाभाव से अभिभूत रहते, तो वे भी उनकी बात मानकर बैठ जाते—और हवाई जहाज़ का आविष्कार न हो पाता। फिर कुछ बड़े वैज्ञानिकों ने यह सिद्धांत प्रस्तुत किया कि कोई भी पदार्थ (matter), ऊर्जा (energy) से तेज गति से नहीं चल सकता। यदि अन्य युवा वैज्ञानिक श्रद्धा-अश्रद्धा से परे हो कर सत्य की ओर अग्रसर न होते, तो आवाज़ की गति से तेज चलने वाले विमान—जैसे कॉनकॉर्ड—का निर्माण भी न हो पाता।