Karma Yoga
कर्म योग
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ। तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥ 3:34॥
इन्द्रियस्य इन्द्रियस्य-अर्थे राग-द्वेषौ-वि-अवस्थितौ, तयोः न वशम् आ-गच्छेत् तौ हि अस्य परि-पन्थिनौ।।
इन्द्रियस्य (इन्द्रिय के) इन्द्रियस्य-अर्थे (इन्द्रिय के विषय में) राग-द्वेषौ-वि-अवस्थितौ (राग और द्वेष स्थित हैं) तयोः (उनके) वशम् (वश में) न (नहीं) आ-गच्छेत् (आना चाहिए) हि (क्योंकि) तौ (वे दोनों) अस्य (मनुष्य के) परि-पन्थिनौ (शत्रु हैं)।
Hindi
इंद्रियों का इंद्रिय-विषयों (इंद्रिय-भोगों) में आकर्षण और विकर्षण—राग और द्वेष—एक प्राकृतिक व्यवस्था के अधीन है। लेकिन मनुष्य को उन दोनों (राग और द्वेष) के वश में नहीं होना चाहिए। वे दोनों ही कल्याण-मार्ग में बाधक हैं।
English
Naturally, our senses are drawn to some things and repelled by others. However, we shouldn't be governed by these attractions or aversions inherent in our nature, as they can derail us {from our true purpose}. (3:34)