Sankhya Yoga
सांख्य योग
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनंजय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥ 2:48॥
योग-स्थः कुरु कर्माणि, सङ्गम् त्यक्त्वा धनञ्जय, सिद्धि-अ-सिद्धयोः समः भूत्वा, समत्वम् 'योगः' उच्यते।
धनञ्जय (हे धनञ्जय)! सङ्गम् (आसक्ति) त्यक्त्वा (छोड़कर) सिद्धि-अ-सिद्धयोः (सिद्धि और असिद्धि में) समः (समान) भूत्वा (होकर), योग-स्थः (योग में स्थित) कर्माणि (कर्म) कुरु (करो) समत्वम् (समत्व ही) योगः (योग) उच्यते (कहा जाता है) ।
Hindi
आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में, यानी सफलता और असफलता तथा हार-जीत में समबुद्धि वाला होकर, योग में स्थित रहते हुए, कर्तव्य कर्मों को करो। {कर्म के फलों में} यह समभाव ही {कर्म} योग कहलाता है।
English
Perform all actions without attachment, remaining anchored in {Karma-} Yoga, maintaining equanimity in both success and failure. Such even-mindedness is the true essence of Yoga. (2:48)