Sankhya Yoga
सांख्य योग
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन। बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ 2:41॥
व्यवसाय-आत्मिका बुद्धिः एका इह, कुरु-नन्दन! बहु-शाखाः हि अनन्ताः च बुद्धयः अव्यवसायिनाम्।
कुरु-नन्दन (हे कुरु-नन्दन अर्जुन), इह (यहाँ) व्यवसाय-आत्मिका (व्यवसाय या कार्य से संबंधित) बुद्धिः (बुद्धि) एका (एकल) है अव्यवसायिनाम् (जो अव्यवसायी हैं) बुद्धयः (उनकी बुद्धियाँ) हि (निश्चित रूप से) बहु-शाखाः (बहुत शाखाओं वाली) च (और) अनन्ताः (असीमित) होती हैं।
Hindi
इस मार्ग में व्यवसाय-बुद्धि अर्थात कार्य-अकार्य, भला-बुरा का निश्चय करने वाली बुद्धि, एक अर्थात एकाग्र रखनी होती है; अन्यथा जिनकी बुद्धि का इस प्रकार एक निश्चय नहीं होता, उनकी बुद्धि अनेक शाखाओं से युक्त और अनंत प्रकार की होती है।
English
O Scion of the Kuru lineage, Arjuna! The resolute have a single, unwavering focus, but the minds of the fickle flutter, hopping from one thought to another {like a bird flits from twig to twig}. (2:41)