Sankhya Yoga
सांख्य योग
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥ 2:40॥
न इह अभि-क्रम-नाशः अस्ति, प्रति-अवायः न विद्यते, सु-अल्पम् अपि अस्य धर्मस्य, त्रायते महतः भयात्।
इह (यहाँ) अभि-क्रम-नाशः (अग्रसर होने का नाश) न (नहीं) अस्ति (है) प्रति-अवायः (उल्टा फलरूप दोष) न (नहीं) विद्यते (मिलता) अस्य (इस) धर्मस्य (धर्म का) सु-अल्पम् (थोड़ा सा) अपि (भी) महतः (महान) भयात् (भय से) त्रायते (रक्षा करता है)।
Hindi
यहाँ, अर्थात इस कर्म-योग के मार्ग में, एक बार आरंभ किए हुए कर्म का नाश नहीं होता, उलटा अर्थात विपरीत फल भी नहीं होता। इस धर्म का थोड़ा-सा भी आचरण बड़े भय से रक्षा कर लेता है।
English
Upon this path {of Karma Yoga}, no effort {towards Self-realization} goes wasted, and no misstep bears harmful repercussions. A mere touch of this sacred doctrine shields one from the profound dread {arising from the relentless cycle of birth and death}. (2:40)
Hindi
इस समबुद्धि (समता) का केवल सच्चा आरंभ ही हो जाए तो उस आरंभ का भी नाश नहीं होता, यानी वह आरंभ सिद्धि तक पहुँचा ही देता है। मन में समत्वबुद्धि प्राप्त करने की जो उत्कंठा लगी है, वही इस समता का आरंभ है। इस आरंभ का कभी अभाव नहीं होता। कामना-पूर्ति के लिए किए गए वैदिक यज्ञों में मंत्र-उच्चारण, यज्ञ-विधि आदि में कमी रह जाए तो उलटे परिणाम हो जाते हैं। मगर निष्काम कर्म-योग में कोई ऐसे उलटे परिणाम नहीं होते। जो अपने कर्मों के फल की ललक-पूर्वक प्रतीक्षा करते रहते हैं, वे हमेशा एक प्रकार के भय में रहते हैं—कहीं अपेक्षित फल नहीं मिला तो क्या होगा! खासकर जब फल पर सारा दारोमदार टिका रहता है, या अपेक्षित फल नहीं मिलने पर नुकसान गंभीर हो सकता है, तो हमेशा महान भय और घबराहट बनी रहती है। लेकिन समबुद्धि-योग या कर्म-योग का अभ्यास उस महान भय से रक्षा कर लेता है।