Sankhya Yoga
सांख्य योग
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत। तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ 2:30॥
देही नित्यम् अ-वध्यः अयम् देहे सर्वस्य, भारत! तस्मात्, सर्वाणि भूतानि न त्वम् शोचितुम् अर्हसि।
भारत (हे भरतवंशी अर्जुन)! अयम् (यह) देही (शरीर में निवास करने वाला आत्मा) सर्वस्य (सभी के) देहे (शरीर में) नित्यम् (सदैव) अ-वध्यः (अवध्य, जिसे मारा नहीं जा सकता) है तस्मात् (इसलिए) सर्वाणि (सभी) भूतानि (प्राणियों के लिए) त्वम् (तू) शोचितुम् (शोक करने के लिए) न (नहीं) अर्हसि (योग्य है)।
Hindi
हे अर्जुन! {सभी के} शरीर में रहने वाली इस आत्मा का वध नहीं किया जा सकता। इस कारण किसी भी प्राणी {के शरीर की मृत्यु} के लिए तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
English
O, Arjuna, Scion of Bharata! Let it be known again, the soul within is beyond destruction; hence, mourn not for any being. (2:30)