2:19श्रीभगवानुवाच

Sankhya Yoga

सांख्य योग

Sanskrit Shloka

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्। उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ 2:19॥

Padacheeda (Word-by-Word)

यः एनम् वेत्ति हन्तारम्, यः च एनम् मन्यते हतम्— उभौ तौ न वि-जानीतः, न अयम् हन्ति न हन्यते।

Anvaya (Construction)

यः (जो) एनम् (इस आत्मा को) हन्तारम् (मारने वाला) वेत्ति (समझता है) च (तथा) यः (जो) एनम् (इसको) हतम् (मरा) मन्यते (मानता है) तौ (वे) उभौ (दोनों ही) न (नहीं) वि-जानीतः (जानते) अयम् (यह आत्मा) न (न) हन्ति (मरता है) न (नहीं) हन्यते (मारा जाता है)।

Meaning

Hindi

जो इस आत्मा को मारनेवाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है, वे दोनों ही अज्ञानी हैं, क्योंकि यह आत्मा वास्तव में न तो किसी को मारती है और न किसी के द्वारा मारी जाती है।


English

Those who believe the soul can be the aggressor or the victim labor under delusion; for the soul neither inflicts nor suffers harm. (2:19)

Commentary

Hindi

आत्मा (soul) 'अकर्ता' है। कर्ता वास्तव में प्रकृति होती है। प्रकृति ही आत्मा के चारों ओर मन-बुद्धि-अहंकार और सूक्ष्म इंद्रियों आदि अपने तत्त्वों का एक त्रिगुणात्मक आवरण बना कर एक कृत्रिम-आत्मा (artificial self) की रचना कर देती है, जो कर्ता और भोक्ता होती है, मगर लगता है कि यह सब वास्तविक आत्मा (real self) द्वारा ही किया और भोगा जा रहा है। इसीलिए ऐसा कहा गया कि आत्मा किसी को न तो मारती है न मरती है। क्रमशः इस सिद्धांत को भगवान आगे आने वाली वार्ता में समझाने वाले हैं।


English

This statement refers to the true Self, the soul, in contrast to the empirical self-created by Nature consisting of the physical body, mind, ego, and intelligence. According to the teachings, the “false”, empirical self is the one responsible for actions and the subsequent experiences, while the true Self remains unaffected, as God will elaborate later.