Moksha Sannyasa Yoga
मोक्ष संन्यास योग
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् । स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥ 18:46॥
यतः प्र-वृत्तिः भूतानाम् येन् सर्वम् इदम् ततम्; स्व-कर्मणा तम् अभि-अर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः।
यतः (जिससे) भूतानाम् (जीवों की) प्र-वृत्तिः (उत्पत्ति हुई है), येन् (जिसके द्वारा) इदम् (यह) सर्वम् (सब-कुछ) ततम् (व्याप्त है), तम् (उसका) स्व-कर्मणा (अपने कर्म से) अभि-अर्च्य (अच्छी तरह पूजा करके) मानवः (मनुष्य) सिद्धिं (सिद्धि) विन्दति (प्राप्त करता है) ।
Hindi
जिस {परमेश्वर} से सारे भूतों (प्राणियों) की उत्पत्ति हुई है, और जिससे यह समस्त ब्रह्मांड व्याप्त है, उस {परमेश्वर} की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त हो जाता है।
English
Through swakarma—one's own duties—worshipping the One from whom all beings originate, and who pervades this entire universe, a man attains success and spiritual fulfillment. (18:46)
Hindi
'वर्क इज़ वरशिप' — 'कर्म ही पूजा है' का सीधा संदेश! इस श्लोक के अर्थ को और पूरी तरह से समझा जा सकता है जब श्लोक 12:6, 7, 10 के साथ इसे पढ़ा जाता है, जहाँ प्रभु साधक को या तो अपने "सभी कार्यों को उन्हें समर्पित करने" (सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य...) का विकल्प देते हैं अथवा "उनके लिए काम करने" (मत्कर्मपरमो भव, तथा मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्...) का विकल्प। इस प्रकार, एक सफाई कर्मचारी पूरी ईमानदारी के साथ सफाई का कर्म करते हुए उच्चतम आध्यात्मिक लक्ष्य (निर्वाण या स्वर्ग) प्राप्त कर सकता है, जबकि एक प्रधानमंत्री नरक में जा सकता है यदि वह उचित देखभाल और ईमानदारी के साथ अपना नियत कार्य नहीं करता है।
English
The profound message conveyed here is that “Work is worship.” This verse’s significance becomes even clearer when considered alongside verses 12:6, 7, and 10, where the Lord provides seekers with two alternatives: either “dedicating all of one’s works and deeds to Him” while actively engaged in work (सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य..) or “working for Him” (“मत्कर्मपरमो भव” and “मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्..”). Thus, whether one is a sweeper or holds any other occupation, they can attain the highest spiritual fulfillment, including Nirvāna or heaven, by performing their duties with utmost sincerity and aligning with other divine instructions. Conversely, even a Chief Minister may be deprived of heaven and Nirvāna if they fail to fulfill their assigned responsibilities with care and integrity.