18:2अर्जुन उवाच

Moksha Sannyasa Yoga

मोक्ष संन्यास योग

Sanskrit Shloka

काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः । सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥ 18:2॥

Padacheeda (Word-by-Word)

काम्यानाम् कर्मणाम् न्यासम् "सन्न्यासम्" कवयः विदुः; सर्व-कर्म-फल-त्यागम् प्राहुः "त्यागम्" वि-चक्षणाः।

Anvaya (Construction)

कवयः (विद्वान लोग) काम्यानाम् कर्मणाम् (काम्य कर्मों के) न्यासम् (त्याग को) "सन्न्यासम्" (सन्न्यास) विदुः (मानते हैं); वि-चक्षणाः (ज्ञानी लोग) सर्व-कर्म-फल-त्यागम् (सभी कर्मों के फल के त्याग को) "त्यागम्" (त्याग) प्राहुः (कहते हैं)।

Meaning

Hindi

विद्वान तो काम्य कर्म, यानी ऐसे कर्म जो प्रकृति द्वारा अनिवार्य नहीं किए गए मगर जिनकी कामना की जा सकती है, के त्याग को "संन्यास" समझते हैं, तथा दूसरे विद्वान सब कर्मों के फल के त्याग को "त्याग" कहते हैं।


English

The renunciation of all actions arising from desire is known as sannyāsa, and the abandonment of the fruits of all actions (not the actions themselves) is called tyāga, as recognized by the wise. (18:2)

Commentary

Hindi

भगवान ने पीछे जिसे 'कर्म-संन्यास' और 'कर्म-योग' कहा था (5:2), उसे ही यहाँ 'संन्यास' और 'त्याग' कह रहे हैं। कर्म-योग में कर्म का नहीं, लेकिन कर्म के फलों का त्याग किया जाता है। संन्यास में काम्य कर्मों का ही त्याग कर दिया जाता है, तथा कर्म-फलों का त्याग भी संन्यासियों के लिए अभीष्ट है। 'संन्यास' और 'त्याग' — दोनों का धात्वर्थ 'छोड़ना' होता है। एक में कर्म को ही छोड़ दिया जाता है, एक में कर्म को स्वीकार करके सिर्फ उसके फल की इच्छा को छोड़ दिया जाता है।