Moksha Sannyasa Yoga
मोक्ष संन्यास योग
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः। यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥ 18:3॥
त्याज्यम् दोष-वत् इति एके कर्म प्राहुः मनीषिणः; यज्ञ-दान-तपः-कर्म न त्याज्यम्— इति च अपरे।
एके (कुछ) मनीषिणः (विद्वान) इति (यह) प्राहुः (कहते हैं कि) कर्म (कर्म) दोष-वत् (दोषयुक्त) त्याज्यम् (त्यागने योग्य) च (और) अपरे (दूसरे) इति (यह कि) यज्ञ-दान-तपः-कर्म (यज्ञ, दान और तप के कर्म) न (नहीं) त्याज्यम् (त्यागने योग्य हैं)।
Hindi
कई मनीषी ऐसा कहते हैं कि सभी काम्य कर्म थोड़े या बहुत दोष-युक्त होते हैं, इसलिए सभी काम्य कर्म त्याग देने-योग्य हैं, जबकि दूसरे मनीषी यह कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप—ये कर्म कदापि त्यागने-योग्य नहीं हैं।
English
Some sages assert that all actions are impure and should be renounced. Others, however, maintain that acts of worship or spiritual pursuits (yajna), self-discipline (tapa), and charitable giving (dāna) are not to be relinquished. (18:3)