Shraddhatraya Vibhaga Yoga
श्रद्धात्रय विभाग योग
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥ 17:3॥
सत्त्व-अनुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति, भारत! श्रद्धा-मयः अयम् पुरुषः, यः यत् श्रद्धः सः एव सः।।
भारत (हे भरतवंशी)! सर्वस्य (सभी मनुष्यों की) श्रद्धा (श्रद्धा) सत्त्व-अनुरूपा (अंतःकरण के अनुरूप) भवति (होती है)। अयम् (यह) पुरुषः (मनुष्य) श्रद्धा-मयः (श्रद्धा से युक्त है) यः (जो) यत्-श्रद्धः (जिस प्रकार की श्रद्धा वाला है) सः (वह) एव (ही) सः (वही है)।
Hindi
हे अर्जुन! सभी मनुष्यों की श्रद्धा {प्रकृति के गुणों द्वारा रचित} उनके सत्त्व (स्वभाव, अंतःकरण) के अनुरूप होती है। जिस व्यक्ति की जैसी {सात्त्विक, राजसी या तामसी} श्रद्धा होती है, वह स्वयं भी वैसा ही होता है। (यानी किसी की श्रद्धा से उसके सत्त्व या अंतःकरण का पता लगाया जा सकता है।)
English
O, Bhārata! The faith held by all individuals is in harmony with their intrinsic disposition. Man's true essence is reflected in his faith, as he embodies the nature of his faith. (17:3)