Shraddhatraya Vibhaga Yoga
श्रद्धात्रय विभाग योग
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु॥ 17:2॥
त्रि-विधा भवति श्रद्धा देहिनाम् सा स्वभाव-जा— सात्त्विकी, राजसी च एव, तामसी च, इति ताम् शृणु।
देहिनाम् (शरीरधारियों की) सा (वह) स्वभाव-जा (स्वभाव से उत्पन्न) श्रद्धा (श्रद्धा) सात्त्विकी (सात्त्विक) च (और) राजसी (राजसी) च (तथा) तामसी (तामसी) — इति त्रि-विधा (ऐसे तीन प्रकार की) एव (ही) भवति (होती है); ताम् (उसके विषय में) शृणु (सुनो)।
Hindi
देहधारी मनुष्यों की वह {शास्त्र-ज्ञान से रहित} सहज स्वभाव से उत्पन्न श्रद्धा तीन प्रकार की—सात्त्विक, राजसी और तामसी—होती है, जिसे तुम सुनो।
English
The natural faith arising out of the innate nature of human beings is of three types—Noble (Sāttvic), Passional (Rājasic), and Ignoble (Tāmasic). You hear that now. (17:2)