Shraddhatraya Vibhaga Yoga
श्रद्धात्रय विभाग योग
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः। परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥ 17:19॥
मूढ-ग्राहेण, आत्मनः यत् पीडया क्रियते तपः, परस्य उत्-सादन-अर्थम् वा— तत् तामसम् उद्-आ-हृतम् ।।
यत् (जो) तपः (तप) मूढ-ग्राहेण (मूढ़तापूर्वक), आत्मनः (स्वयं की) पीडया (पीड़ा के सहित) वा (या) परस्य (दूसरे का) उत्-सादन-अर्थम् (अनिष्ट करने के लिए) क्रियते (किया जाता है), तत् (वह) तामसम् (तामसिक) उद्-आ-हृतम् (कहा गया है)।
Hindi
जो तपस्या मूर्खता-पूर्वक स्वयं को {अधिक} पीड़ा देते हुए अथवा दूसरे का अनिष्ट करने के लिए किया जाता है, वह तप तामस तप कहा गया है।
English
Austerity, practiced foolishly inflicting pain on oneself or to harm others, is called Dark (Tāmasic) austerity. (17:19)
Hindi
पूजा-पाठ के नाम पर नित्य दो बजे दिन तक अपने को भूखा रख कर रोज कष्ट सहन करना और गैस्ट्रिक, अल्सर-जैसी बीमारियाँ मोल लेना भी इस तामस तप में आ सकता है। सुबह कम-से-कम कुछ कंद-मूल-फल-दूध आदि ग्रहण कर लें तो बाद में पूजा के बाद अन्न लेना चलेगा। भगवान यह मंशा पहले ही प्रकट कर चुके हैं (17:8) कि भोजन ऐसा हो {और इस प्रकार से किया जाए} कि रोग-मुक्त रहें और आयु बढ़े। तभी तो अधिक दिनों तक शरीर से धर्म-साधन हो सकेगा! लेकिन कई मानवीय गुरु महानतम गुरु भगवद्-गीता के विरुद्ध जाकर शिष्यों को औपचारिक पूजा-पाठ पूरा होने तक खाली पेट ही रहने को कह कर उनका अकल्याण ही करते हैं। स्त्रियाँ इससे सबसे अधिक प्रभावित होती हैं, क्योंकि बच्चों को स्कूल और पति को कार्यालय भेजते-भेजते उन्हें काफी समय लगता है। फिर अन्य अनिवार्य गृह-कार्यों को निष्पादित करते-करते, और तब पूजा-पाठ पूर्ण करते-करते उन्हें दिन के एक या दो बज जाते हैं। तब तक वे अन्न तो क्या फल या दूध भी ग्रहण नहीं करतीं ओर अनेक रोगों का शिकार हो जाती हैं। आध्यात्मिक प्रगति में भोजन या भूखा रहना एक आनुषंगिक क्रिया है, प्रधान नहीं। जो मुख्य चीजें हैं, वे भगवद्-गीता में दी गई हैं। भगवद्-गीता में भगवान ने कहीं कहा कि जो उनकी पूजा के लिए दो बजे दिन तक रोज भूखा रहे, वह उन्हें प्रिय है? इस श्लोक में तो वे इससे विपरीत ही बात कर रहे हैं! उन्हें कौन प्रिय है, यह उन्होंने 12वें अध्याय के श्लोकों 13 से 20 में समझाया, अध्याय 18 के श्लोकों 68-70 में बताया, 16 वें अध्याय के श्लोक 16:5 में इंगित किया। इसलिए स्त्रियाँ पुरोहितों-पंडितों की न सुन कर भगवद्-गीता को मानें तो अधिक कल्याण हो! अब जब स्त्रियाँ पढ़-लिख गई हैं और भगवद्-गीता का अध्ययन स्वयं कर सकती हैं, तो सिर्फ अज्ञ या अल्पज्ञ पंडितों-पुरोहितों पर क्यों निर्भर करें? भगवान तो यह भी कह चुके कि हमारे शरीर के अंदर जठराग्नि के रूप में भी वे स्वयं ही प्रकट हैं (15:14)। अब भला उस जठराग्नि-रूप प्रभु को देर तक अतृप्त रख कर पूजा में बैठने से क्या लाभ? भगवान ने निश्चय ही तप करने को 18:5 में सभी के लिए अनिवार्य बना दिया है, मगर उस तप का अर्थ तो इसी सत्रहवें अध्याय के श्लोकों 14-16 में देखें! सप्ताह में एक दिन या 15 दिनों में एक बार एकादशी आदि में उपवास रख कर मन को शांत कर लें। मगर रोज-रोज ऐसा न करें। पारंपरिक वैदिक धर्म को अक्सर 'वर्णाश्रम धर्म' कहा जाता है। इसकी शास्त्रीय 'आश्रम' व्यवस्था के अंतर्गत आयु के अनुसार जीवन के चार पड़ाव या काल-खंड हैं, जिन्हें 'आश्रम' कहा गया। यह 'आश्रम' वह आश्रम नहीं है जिसे संतों और ऋषियों का मिट्टी और घास-फूस का घर समझा जाता है। इस आश्रम व्यवस्था के अनुसार पचास की उम्र के बाद व्यक्ति को गृहस्थ-आश्रम त्याग कर 'वानप्रस्थ' आश्रम में प्रवेश कर जाना चाहिए। शास्त्रों में, और व्यवहार में भी, वानप्रस्थ आश्रम में कम ही लोग प्रवेश करते सुने गये, लेकिन आदर्शों के स्तर पर इसकी अनुशंसा अनेक शास्त्रों में मिलती है। 50 से 75 तक की आयु तक के लंबे समय तक अपने शरीर को 'तप' के नाम पर वैसे ही तपाने या कष्ट में रखने का विधान शास्त्रों में मिलता है जो गीता के इस श्लोक के अभिप्राय से नितांत विरुद्ध है, और भगवान द्वारा 'तामसी' तप के रूप में मान्य है। महाभारत में इस वानप्रस्थ आश्रम की जो स्पष्ट रूप-रेखा महर्षि भृगु द्वारा दी गई है^11 वह देखने-सुनने योग्य है— "तीसरे आश्रम वानप्रस्थ का पालन करने वाले मनुष्य धर्म का अनुसरण करते हुए पवित्र तीर्थ में, नदियों के किनारे, झरनों के आसपास तथा मृग, भैंस, सूअर, सिंह एवं जंगली हाथियों से भरे हुए एकांत वनों में तप करते हुए विचरते रहते हैं। गृहस्थों के उपभोग में आने वाले ग्रामजनोचित सुंदर वस्त्र, स्वादिष्ट भोजन और विषयभोगों का परित्याग करके वह जंगल में अपने-आप पैदा होने वाले अन्न, फल-मूल तथा पत्तों का परिमित, विचित्र एवं नियत आहार करते हैं। भूमि पर ही बैठते हैं, जमीन, पत्थर, रेत, कंकरीली मिट्टी, बालू अथवा राख पर ही सोते हैं। काश, कुश, मृगचर्म और वृक्षों की छाल से बने वस्त्रों से अपना शरीर ढँकते हैं, सर के बाल, दाढ़ी, मूँछ, नाखून और रोम सदा धारण किए रहते हैं। नियत समय पर स्नान करके निश्चित काल का उल्लंघन न करके हुए बलिवैश्वदेव तथा अग्निहोत्र आदि कर्मों का अनुष्ठान करते हैं। सवेरे हवन-पूजन के लिए समिधा, कुशा और फूल आदि का संग्रह करके आश्रम को झाड़-बुहार लेने के पश्चात उन्हें कुछ विश्राम मिलता है। सर्दी, गर्मी, वर्षा और हवा का वेग सहते-सहते उनके शरीर के चमड़े फट जाते हैं। नाना प्रकार के नियमों का पालन और सत्कर्मों का अनुष्ठान करते रहने से उनके रक्त और मांस सूख जाते हैं और शरीर की जगह चाम से ढकी हुई हड्डियों का ढांचा-मात्र रह जाता है। फिरभी धैर्य रखकर साहसपूर्वक शरीर का भार ढोते रहते हैं। जो पुरुष नियम के साथ रहकर ब्रह्मर्षियों द्वारा आचरण में लाई हुई इस वानप्रस्थ धर्म की विधि का अनुष्ठान करता है, वह अग्नि की भांति अपने दोषों को भस्म करके दुर्लभ लोकों को प्राप्त करता है।" संभव है, कभी ऐसे कुछ ब्रह्मर्षि हुए हों जो ऐसे कष्ट झेल कर भी जीवित बच गए हों, किंतु ऐसे लोग विरले ही हुए होंगे जो कंकड़ और बालू पर सो कर काम चला लेते हों। यह सब कष्ट 'मोक्ष' पथ पर गमन करने के लिए बताये गये। मगर भगवान ने मोक्ष के ऐसे रास्ते भगवद्-गीता में बताये हैं कि ऐसे विचित्र नियमों का पालन करने की आवश्यकता ही नहीं। भगवान ने तो मोक्ष के 'धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्' वाले कई रास्ते बता रखे हैं। यह भी ध्यान देने-योग्य है कि हमारे आदर्श श्रीराम और श्रीकृष्ण, इन दोनों में से कोई भी वानप्रस्थ आश्रम में प्रविष्ट नहीं हुआ। और-तो-और, वे कभी संन्यास आश्रम में भी नहीं प्रविष्ट हुए। संन्यास तो बहुतेरे लोगों के लिए फिर भी अनुकरणीय हो सकता है, मगर वानप्रस्थ का जिस रूप में ऊपर वर्णन आया है, वह सैद्धांतिक रूप से नितांत अस्वीकार्य है। यह जरूर है कि 50-60 वर्षों की आयु के बाद मनुष्य को आध्यात्मिक साधना को अधिक समय देना चाहिए और संसार से धीरे-धीरे निवृत्त हो जाना चाहिए, भले ही व्यक्ति जंगल में न जाये। भगवद्-गीता पर आधारित भगवद्-धर्म वानप्रस्थ के लिए वैदिक धर्म के इन अनावश्यक रूप से कठोर या क्रूर नियमों की अनुशंसा नहीं करता।
English
Fasting can bring both physical and spiritual benefits when practiced mindfully and in moderation. Striking a balance between spiritual practices and maintaining good health is essential. Occasional fasting, such as once a week or once a fortnight, can detoxify the body and contribute to one's well-being. However, extreme fasting, such as starving oneself daily until the afternoon, or frequent fasting, can lead to various health issues and may not align with the true essence of spiritual practices as outlined in the Bhagavad-Gitā. In many spiritual traditions, including Hinduism, fasting is observed on specific occasions or as a form of self-discipline. However, it should be done wisely and without causing harm to the body. Following Bhagawān Krishna’s teachings and understanding the Bhagavad-Gitā directly, especially the current verse, can be truly beneficial for spiritual seekers, as half-educated priests and guides may not provide the right guidance. The path to spiritual growth involves a holistic approach, taking into account physical health, mental well-being, and a genuine connection with the Divine. Balancing spiritual practices with a healthy lifestyle can contribute to a more fulfilling and harmonious spiritual journey.
^11 श्लोक 1-२, मोक्षधर्मपर्व, (शांति पर्व), महाभारत (गीतप्रेस, पंचम खंड)