Shraddhatraya Vibhaga Yoga
श्रद्धात्रय विभाग योग
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥ 17:20॥
दातव्यम् इति यत् दानम् दीयते अन्-उप-कारिणे, देशे, काले च, पात्रे च— तत् दानम् सात्त्विकम् स्मृतम्।
दातव्यम् इति ("यह देना चाहिए" इस कर्तव्यभाव से) यत् (जो) दानम् (दान) देशे (देश में) च (और) काले (समय में) च पात्रे (योग्य व्यक्ति के लिए) अन्-उप-कारिणे (जिसे बदले में प्रत्युपकार की अपेक्षा नहीं हो), दीयते (दिया जाता है), तत् (वह) दानम् (दान) सात्त्विकम् (सात्त्विक) स्मृतम् (स्मरणीय) है।
Hindi
दान देना ही कर्तव्य है, ऐसे भाव से उचित स्थान, उचित समय और उचित पात्र के प्राप्त होने पर, जिसने हमारा कभी कोई उपकार नहीं किया हो ऐसे व्यक्ति के प्रति, या {जिसे दान दिया जा रहा हो उससे} प्रत्युपकार की आशा के बिना, जो दान दिया जाता है, वह दान सात्त्विक दान कहा जाता है।
English
Charitable giving is best when it is extended to a deserving recipient who has not rendered any service to the giver. When such acts of charity are performed at the right time and place, with a deep sense of duty and conviction, they are considered to be Noble (Sāttvic) acts of giving. (17:20)