17:14श्रीभगवानुवाच

Shraddhatraya Vibhaga Yoga

श्रद्धात्रय विभाग योग

Sanskrit Shloka

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्। ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥ 17:14॥

Padacheeda (Word-by-Word)

देव, द्विज, गुरु, प्राज्ञ पूजनम्, शौचम्, आर्जवम्, ब्रह्म-चर्यम्, अहिंसा च शारीरम् तपः उच्यते।

Anvaya (Construction)

देव (देवता), द्विज (ब्राह्मण), गुरु (गुरु), प्राज्ञ (ज्ञानी) पूजनम् (पूजा), शौचम् (स्वच्छता), आर्जवम् (सरलता, सत्यता, निष्कपटता), ब्रह्म-चर्यम् (ब्रह्मचर्य), च (और) अहिंसा (अहिंसा), शारीरम् (शारीरिक) तपः (तप) उच्यते (कहा जाता है)।

Meaning

Hindi

देवता, द्विज, गुरु और प्राज्ञजनों (प्रज्ञावान या ज्ञानवान जनों) का पूजन, शरीर को स्वच्छ रखना, सरल-सादा जीवन, ब्रह्मचर्य और अहिंसा—यह शरीर-का तप कहा जाता है।


English

Honoring the deities, twice-borns, Gurus (spiritual guides), and Prāgyas (the wise and learned ones); keeping the body clean, living a simple life, practicing celibacy and non-violence—these are called austerities of the body. (17:14)

Commentary

Hindi

आर्जवम् संस्कृत में "आर्जवम्" शब्द "ऋजु" धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है "सीधा", "सरल", "ईमानदार"। आर्जवम् या सरलता, सत्यता और निष्कपटता तो मन का गुण है, तो इसे यह शरीर के तप में क्यों गिना गया? मन में सत्यता और सरलता निश्चय ही मन का गुण है, लेकिन जब वही सरलता शरीर में झलकती है, तो वह "शारीरिक तप" कहलाती है। भगवद्-गीता में "शारीरिक तप" का अर्थ केवल शारीरिक कष्ट उठाना नहीं, बल्कि शरीर के माध्यम से किया गया आचरण भी है। इसलिए, "आर्जवम्" को "शारीरिक तप" में गिनाया गया, क्योंकि इसका हमारे शरीर के हावभाव, वाणी, और व्यवहार में प्रकट होना आवश्यक है। द्विज 'द्विज' का अर्थ होता है 'जिसका दूसरी बार जन्म हुआ हो'। जन्म होने पर हमें भौतिक शरीर मिलता है। इस शरीर के रहते हुए 'दूसरा जन्म' तब होता है जब इस शरीर में ज्ञान-शरीर और संस्कार-शरीर उदित होता है। पुरातन काल में उपनयन के बाद वर्षों शास्त्र-अध्ययन के उपरांत वह ज्ञान-शरीर उत्पन्न होता था। जनेऊ धारण करने से यह ज्ञान-शरीर उत्पन्न नहीं होता। जिसमें वह आध्यात्मिक ज्ञान-शरीर उत्पन्न हो जाए वह द्विज हो गया, और भगवद्-गीता के अनुसार वह पूज्य हो गया। जो जन्मगत वर्ण-व्यवस्थावादी यह मानते हैं कि 'द्विज' का विशेष अर्थ यहाँ ब्राह्मण है, उन्हें भी उस कहानी से सबक लेना चाहिए जिसमें आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु को यह परामर्श देते हैं कि उसे ब्रह्मचर्य (विद्यार्थी) का व्रत धारण करना चाहिए, क्योंकि उसके परिवार के सदस्यों ने केवल जन्म के आधार पर ब्राह्मणत्व का दावा नहीं किया है (छांदोग्य उपनिषद 6:1:1) गुरु माया से मुक्ति और मोक्ष-प्राप्ति के लिए गुरु कैसा होना आवश्यक है, इस पर भागवत पुराण में चर्चा है— “तस्माद्गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम्। शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम्॥” अर्थात, परम कल्याण के जिज्ञासु को शब्द-ब्रह्म और परब्रह्म—दोनों में कुशल और शांति-परायण गुरु की शरण प्राप्त करनी चाहिए। अर्थ यह कि गुरु वही बनने योग्य है जो शांतचित्त हो, शास्त्रज्ञान से युक्त हो ताकि उचित उपदेश दे सके, और साथ ही ब्रह्मज्ञान में भी अनुभवी हो, जिससे अपने व्यावहारिक अनुभव बाँट सके। ऐसा ही गुरु पूजनीय है।। श्रीकृष्ण परम गुरु आज के युग में उपर्युक्त अनुच्छेद में बताए गए गुणों वाला गुरु मिलना अत्यंत कठिन हो गया है। इसलिए, काल के बदले हुए स्वरूप को देखते हुए, यदि ऐसा मानवीय गुरु उपलब्ध न हो तो श्रीकृष्ण को परम गुरु के रूप में स्वीकार करना चाहिए और उनकी वाणी—भगवद् गीता को, उनकी अनुपस्थिति में, पूर्ण गुरु-ग्रंथ के रूप में ग्रहण करना चाहिए। गीता में अर्जुन ने श्रीकृष्ण को 'महानतम गुरु' कहा है, जो सत्य है— “पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्। न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव॥ (11.43)” “आप इस समस्त चर-अचर जगत के पिता, अनुपम प्रभाव वाले, महानतम गुरु एवं परम वंदनीय हैं! तीनों लोकों में कोई आपका समकक्ष नहीं, फिर आपसे बड़ा कैसे हो सकता है?” भगवद् गीता का नित्य अध्ययन — उसे समझते हुए और भावपूर्वक करते रहना — जीवन की समस्याओं से जूझने और मोक्ष से संबंधित जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए वही मार्गदर्शन देता है, जो किसी अत्यंत ज्ञानी गुरु से मिल सकता है। फिर भी, यदि जीवन में कोई गंभीर समस्या आ जाए—जिसका समाधान तत्काल आवश्यक हो—तो जिन्होंने श्रीकृष्ण को महानतम गुरु के रूप में हृदय से स्वीकार कर लिया है, उन्हें निम्नलिखित श्लोक का पाठ करना चाहिए। निश्चय ही उन्हें स्वप्न में या अन्य प्रकार से उचित मार्गदर्शन मिलेगा जिससे उनकी समस्या का समाधान होगा। भक्तों का अनुभव है कि बाद में श्रीकृष्ण स्वयं प्रत्यक्ष होकर शिष्य का मार्ग दर्शन भी करते हैं। यही वह श्लोक है, जिसके बाद श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया और उसकी समस्या का समाधान किया— “कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः। यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥ (2.7)” “दीनता से मेरा सहज स्वभाव नष्ट हो गया है, तथा अपने धर्म या कर्तव्य के बारे में मन मोह से भ्रमित हो गया है। इसलिए मैं आपसे पूछता हूँ कि जो मेरे लिए कल्याणकारी हो, वह कहिए! मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में हूँ, मुझको शिक्षा दीजिए!”" भगवद् गीता परम गुरु का ग्रंथ जो लोग गीता का नित्य अध्ययन गुरु-ग्रंथ के रूप में करते हैं, उनके लिए व्यक्तिगत चर्चा हेतु भगवद् गीता में निष्णात प्राज्ञजनों का संसर्ग लाभप्रद हो सकता है। गीता जैसा संपूर्ण ज्ञान किसी मानवीय गुरु के पास नहीं हो सकता। मानवीय गुरु का शरीर तो नष्ट हो जाता है, किंतु गीता सदैव उपलब्ध रहेगी। इसलिए यदि भागवत पुराण में बताए अनुसार कोई मानवीय गुरु मिल भी जाए, तो भी गीता को 'पूर्ण गुरु-ग्रंथ' और श्रीकृष्ण को 'परम गुरु' स्वीकार करना उचित है। मानवीय गुरु भी तभी स्वीकार्य है जब वह स्वयं गीता के दर्शन में निष्णात हो और उसी के प्रकाश से शिष्य के जीवन को आलोकित करता हो। वास्तव में वही गुरु जीवंत रूप में पूर्णगुरु-ग्रंथ और परम गुरु के साथ संबंध-सूत्र बनता है। ध्यान रहे—गीता के यथेष्ट ज्ञान के बिना कोई भी व्यक्ति अन्य शास्त्रों का विद्वान होने पर भी गुरु बनने योग्य नहीं है, क्योंकि किसी भी अन्य शास्त्र में वह समग्र विद्या नहीं है जो गीता में है—जो जीवन को दुःख-मुक्त करे और मृत्यु के बाद मुक्ति दिलाए। यह बात व्यापक रूप से स्वीकार्य है। अधिकांश शास्त्रों में कालक्रम से अनेक मिश्रण आ गए हैं और बीच-बीच में अनेक विचित्र और निकृष्ट बातें भी सम्मिलित हो गई हैं। उनमें अनासक्ति के उस सिद्धांत का स्पष्ट प्रतिपादन नहीं मिलता जो दुःख-निरोध के लिए आवश्यक है।। मानवीय गुरु का परिवर्तन अक्सर लोग संयोगवश या जल्दबाजी में ऐसे व्यक्ति को गुरु बना लेते हैं, जो योग्य नहीं होता और उचित मार्गदर्शन नहीं करता—सिर्फ़ मंत्र देकर छोड़ देता है। ऐसे में शास्त्र कहते हैं—यदि गुरु के पास एक वर्ष तक रहने पर भी शिष्य को थोड़ा भी हर्ष और प्रबोध न मिले, तो वह उसे छोड़कर दूसरे गुरु का आश्रय ले। किंतु नया गुरु ग्रहण करने के बाद भी पूर्व गुरु, गुरु-भाइयों, उनके परिवारजनों और प्रेरकों का अपमान न करे। (श्रीशिवमहापुराण, द्वितीय खंड, वायवीय संहिता, उत्तर खंड, अध्याय 15, पृष्ठ 945, गीता प्रेस) “अज्ञान रूपी बंधन से छूटना ही जीवमात्र के लिए परम साध्य है। अतः जो विशेष ज्ञानवान है, वही गुरु जीव को उस बंधन से मुक्त कर सकता है।” (संक्षिप्त शिवपुराण, विद्येश्वर संहिता, पृष्ठ 85, गीता प्रेस)) गुरु के प्रति श्रीराम का आदर्श व्यवहार अपने मानवीय गुरु से कैसा व्यवहार करना चाहिए और उनकी ‘पूजा’ किस प्रकार करनी चाहिए, इसका एक आदर्श श्रीराम ने श्रीरामचरितमानस में प्रस्तुत किया है। जब गुरु वशिष्ठ श्रीराम के भवन में उन्हें युवराज पद पर अभिषिक्त किए जाने का समाचार देने और उनसे विमर्श करने आते हैं, तो श्रीराम द्वारा उनका स्वागत किस प्रकार किया गया, यह दृश्य देखें— राजा दशरथ ने वशिष्ठजी को बुलवाया और समयोचित शिक्षा देने के लिए श्रीरामचंद्रजी के सदन में भेजा। गुरु का आगमन सुनते ही श्रीरघुनाथजी द्वार पर आए और उनके चरणों में सिर नवाया— “तब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए। रामधाम सिख देन पठाए॥ गुरु आगमनु सुनत रघुनाथा। द्वार आइ पद नायउ माथा॥” (अयोध्याकांड, 8:1) आदरपूर्वक अर्घ्य देकर श्रीराम ने उन्हें घर में लाया और षोडशोपचार से पूजा कर उनका सम्मान किया।^5 फिर सीताजी सहित उनके चरण स्पर्श किए और कमल समान हाथ जोड़कर श्रीराम ने विनम्रता से कहा— “सादर अरघ देइ घर आने। सोरह भाँति पूजि सनमाने॥ गहे चरन सिय सहित बहोरी। बोले रामु कमल कर जोरी॥” (अयोध्याकांड, 8:2) श्रीराम ने कहा—यद्यपि सेवक के घर स्वामी का आगमन मंगल का मूल और अमंगल का नाश करने वाला होता है, तथापि हे नाथ! उचित तो यही था कि प्रेमपूर्वक दास को ही कार्य हेतु बुला भेजते। यही नीति है— “सेवक सदन स्वामि आगमनू। मंगल मूल अमंगल दमनू॥ तदपि उचित जनु बोलि सप्रीति। पठइअ काज नाथ असि नीति॥” (अयोध्याकांड, 8:3) परंतु प्रभु (आप) ने प्रभुता त्यागकर स्वयं यहाँ पधारकर जो स्नेह किया, उससे आज यह घर पवित्र हो गया। हे गोसाईं! अब जो आज्ञा होगी, वही मैं करूँगा। सेवक को स्वामी की सेवा का जो लाभ मिलना चाहिए, वह आज मुझे प्राप्त हुआ— “प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू। भयउ पुनित आजु यहु गेहू॥ आयसु होइ सो करौं गोसाईं। सेवकु लहइ स्वामि सेवकाई॥” (अयोध्याकांड, 8:4) गुरु के प्रति ऐसा आदर और पूजा सभी के लिए अनुकरणीय है। इस प्रकार श्रीराम का आचरण हर साधक को यह शिक्षा देता है कि गुरु का आदर केवल बाह्य सम्मान से नहीं, बल्कि नम्रता, श्रद्धा और सेवा-भाव से करना चाहिए।। 'गुरुडम' या 'गुरुवाद' जैसे अधिकांश व्यवस्थाओं में काल-परिवर्तन के साथ अनेक विकार आ जाते हैं, वैसे ही गुरु-व्यवस्था में भी विकृतियाँ आ गईं। धीरे-धीरे इस व्यवस्था ने ‘गुरुडम’ या ‘गुरुवाद’ का रूप ले लिया, जिसमें गुरु ने ईश्वर को पीछे कर स्वयं को ही पूजित करवाना आरंभ कर दिया। कुछ ने अध्यात्म के आवरण में लोभ और कामनाओं को पाल लिया और धन-संपत्ति के संग्रह में ही उनका ध्यान ईश्वर-भजन से भी अधिक स्थिर हो गया। कुछ शास्त्र-वचनों ने भी इस प्रवृत्ति को बल दिया। उदाहरणस्वरूप यह लोकप्रिय श्लोक देखें— “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥” अर्थात—“गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही महादेव हैं, गुरु ही साक्षात् परब्रह्म हैं—ऐसे श्रीगुरु को मैं नमस्कार करता हूँ।” इसी प्रकार, कुछ गुरुओं के लिए धनार्जन ही गुरु बनने का प्रयोजन बन गया। कुछ धर्मग्रंथों में भी इस प्रवृत्ति को समर्थन देने वाले वचन मिलते हैं। उदाहरण के लिए शिव महापुराण का यह उद्धरण देखें— “शिष्य को चाहिए कि तब तक गुरु की आराधना करे, जब तक वे प्रसन्न न हो जाएँ। उनके प्रसन्न हो जाने पर शीघ्र ही शिष्य के पाप का नाश हो जाता है। अतः धन, रत्न, क्षेत्र, गृह, आभूषण, वस्त्र, वाहन, शय्या, आसन—यह सबकुछ अपने सामर्थ्य के अनुसार गुरु को प्रदान करना चाहिए। यदि शिष्य परमगति चाहता है, तो उसे धन की कृपणता नहीं करनी चाहिए।” (शिव महापुराण, वायवीय संहिता, उत्तर खंड, अध्याय 15, श्लोक 50–52, गीता प्रेस, प्रथम खंड, पृ. 945) ऐसे वचनों की अपेक्षा यह कहना अधिक समीचीन होता कि— “शिष्य हर प्रकार से—तन, मन और धन से—गुरु की सेवा करे।” इसीलिए भगवान कृष्ण ने ईश्वर-पूजन के लिए भी “पत्रं पुष्पं फलं तोयं” कहा था, क्योंकि वैदिक यज्ञ और कर्मकांड इतने खर्चीले हो गए थे कि उन्होंने धर्म और अध्यात्म को निर्धन की पहुँच से बाहर कर दिया था। गुरु सामान्यतः संन्यासी या संन्यासी-सदृश गृहस्थ ही होते थे। जैसे—गुरु वशिष्ठ एक गृहस्थ संन्यासी थे। उनके जीवन-निर्वाह हेतु कुछ संसाधनों की आवश्यकता स्वाभाविक थी। किंतु उन्हें अधिक धन की आवश्यकता नहीं थी। यदि अधिक धन उपलब्ध होता, तो उसका उपयोग गुरु द्वारा व्यक्तिगत लाभ के बजाय परमार्थ कार्यों में व्यय होना चाहिए—यही उचित है।। गुरु द्वारा मंत्र-दीक्षा का प्रसंग मंत्र-दीक्षा के विषय में अधिक जानकारी के लिए श्लोक 10.25 की टिप्पणी देखी जानी चाहिए। यहाँ संक्षेप में केवल इतना कहना उचित होगा कि— मंत्र सामान्यतः ऋषियों या संतों द्वारा निर्मित होते हैं। प्रायः सभी शास्त्र इस पर सहमत हैं कि यदि मंत्र-दीक्षा लेनी हो तो किसी ऐसे संत से ही लेनी चाहिए जो उस मंत्र का अभिप्राय और नियम भलीभाँति जानता-समझता हो। ध्यान रहे कि हर देवता के प्रत्येक मंत्र का नियम एक जैसा नहीं होता। उदाहरण के लिए—पंचाक्षर मंत्र “ॐ नमः शिवाय” का जप किसी को “ॐ नमः शिवाय” के रूप में करना है, किसी को केवल “नमः शिवाय” के रूप में, अथवा “शिवाय नमः” के रूप में—यह अंतर केवल वही गुरु बता सकता है जो शास्त्रों में पारंगत और मंत्र का ज्ञाता हो। फिर, मंत्र-जप के साथ अनेक प्रकार के नियम भी जुड़े होते हैं, जिनका पालन करना आवश्यक है। अन्यथा विपरीत फल भी हो सकता है या मंत्र-जप निष्फल हो सकता है। किंतु ईश्वर का नाम-जप मात्र से भी साधक का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। निष्काम भाव से ईश्वर प्राप्ति के लिए नाम-जप करने से भी ईश्वर की प्राप्ति संभव है, बशर्ते कि गीता में बताए गए अन्य शर्तों का पालन किया जाए। नाम जप के लिए गुरु-दीक्षा की अनिवार्यता नहीं होती। निष्काम नाम-जप के लिए कोई बंधनकारी नियम भी नहीं हैं। भगवद् गीता का प्रत्येक श्लोक अपने आप में एक मंत्र है—और किसी भी संत द्वारा रचित मंत्र से अधिक शक्तिशाली है। ईश्वर-प्राप्ति के लिए, या संकट-समाधान के लिए, गीता के किसी भी उपयुक्त श्लोक का जप किसी मानवीय गुरु से दीक्षा लिए बिना भी किया जा सकता है। ईश्वर से बिना किसी मध्यस्थ के सीधा संपर्क संभव है। न्यायालय में मुकदमा लड़ने के लिए क़ानून और प्रक्रियाओं का जानकार वकील लेना उपयोगी हो सकता है, किंतु अनिवार्य नहीं, क्योंकि मुवक्किल को स्वयं भी अपनी पैरवी करने का अधिकार होता है। ठीक उसी प्रकार, भगवान और भक्त के बीच किसी गुरु की आवश्यकता हो सकती है, परंतु अनिवार्यता नहीं। भगवान तो केवल तीव्र भावना और अनन्य प्रेम से भी प्राप्त किए जा सकते हैं।। प्राज्ञ प्राज्ञ का वर्ण-व्यवस्था (व्यवसायों और सामाजिक स्तर के चार खंडों वाला वर्गीकरण) से कोई संबंध नहीं है। प्राज्ञ वह है जो विवेकशील, पवित्र, ज्ञानी और प्रबुद्ध हो। महाभारत में भीष्म को बार-बार ‘महाप्राज्ञ’ कहा गया है।। ब्रह्मचर्य संन्यासियों के लिए पूर्ण ब्रह्मचर्य और गृहस्थों के लिए एक-पत्नीव्रत या एक-पतिव्रत होना ब्रह्मचर्य माना गया है। 'ऋतूकालाभिगामी स्यात्स्वदार निरतः सदा। ..ब्रह्मचार्य्येव भवति यत्र तत्राश्रमे वसन्'—जो अपनी ही स्त्री से प्रसन्न और ऋतुगामी होता है, ..वह गृहस्थ भी ब्रह्मचारी के सदृश है (मनु0, 3:45,50)। भगवान् भी पहले ही भगवद्-गीता में कह चुके हैं कि ‘मैं धर्म से अ-विरुद्ध काम हूँ (7:11)।’ लेकिन गृहस्थों को भी कामी होना उचित नहीं (2:70)। महाभारत के 'अनुशासनपर्व' के अंतर्गत 'दानधर्मपर्व' के पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः में भगवान शिव के मुख से यह कथन ध्यान देने-योग्य है—"व्रतपूर्वक धारण किया हुआ निष्कलंक ब्रह्मचर्य सदा सुरक्षित रहे, ऐसा नैष्ठिक ब्रह्मचारियों के लिए विधान है। गृहस्थों के लिए जन्म-नक्षत्र का योग आने पर, पवित्र स्थानों में, पर्वों के दिन, तथा देवता-संबंधी धर्म-कृत्यों में गृहस्थों को ब्रह्मचर्य का पालन अवश्य करना चाहिए। जो सदा एकपत्नीव्रत रहता है, वह ब्रह्मचर्य का ही पालन करता है।" (पृष्ठ 640, षष्ठ खंड, महाभारत, गीता प्रेस) महाभारत के ही राजधर्मानुशासन पर्व में धर्मराज युधिष्ठिर तो यहाँ तक कहते हैं कि जो गृहस्थ ऋतुकाल में अपनी पत्नी के साथ समागम नहीं करता वह अधर्मी है। (श्लोक 14, चतुस्त्रिंशोऽध्यायः, राजधर्मानुशानपर्व, शांतिपर्व)। तप पर विशेष वैदिक और पौराणिक हिंदू धर्म-धाराओं में शारीरिक तप का अर्थ भिन्न था। वह अधिकांशतः आत्मपीड़क तप था, जिसकी निंदा भगवान ने भगवद्-गीता में दो प्रसंगों में की है। ये आत्म-पीड़क तप बार-बार पुराणों और रामायण-महाभारत आदि में मिलते हैं। ये तप आध्यात्मिक सिद्धियों और देवता की कृपा से मनोकामना पूर्ण करने आदि के लिए सैकड़ों या हजारों वर्षों तक किए जाने का वर्णन मिलता है। कभी एक पैर पर खड़े होकर तो कभी पैर के अंगूठे पर ही खड़े होकर सैकड़ों वर्षों तक लंबे तप दिखाए जाते थे। उदाहरण के लिए एक अपेक्षाकृत 'मामूली' शारीरिक तप को लें जिसका वर्णन महाभारत के दानधर्मपर्व के अठारहवें अध्याय में मिलता है। इसमें आलंबायन नामक श्रद्धालु द्वारा सौ पुत्रों की प्राप्ति के लिए शिवकृपा प्राप्त करने हेतु सौ वर्षों तक तप करने का वर्णन है। दानधर्मपर्व में ही दक्ष की पुत्री सुरभि द्वारा पुत्र-प्राप्ति के लिए ग्यारह हजार वर्षों तक कैलाश के शिखर-जैसे ठंढे स्थान में एक पैर पर खड़े हो कर तप करने का उल्लेख है (श्लोक 29, त्र्यशीतितमोऽध्यायः, दानधर्मपर्व)। 16 वें अध्याय के प्रथम श्लोक की टिप्पणी में वैदिक और पौराणिक संस्कृति के आत्मपीड़क तपों पर विस्तृत चर्चा की गई है। जिज्ञासु उसे जरूर पढ़ें। भगवान गीता में ऐसे आत्म-पीड़क तपों का अनुमोदन नहीं करते। उन्होंने इनके बदले शारीरिक तपों में जो चीजें शामिल की हैं, उन्हें हमने इस श्लोक में देखा। ईश्वर भला मनुष्यों के आत्म-पीड़न से क्यों प्रसन्न हों! वास्तव में ईश्वर की प्रसन्नता अन्य, अधिक सार्थक चीजों से प्राप्त होती है, यह गीता का संदेश है। इस श्लोक के संदर्भ में एक प्रश्न यह उठता है कि भगवान ने द्विज, गुरु, प्राज्ञ और देवता के पूजन को 'शरीर का तप' क्यों कहा? 'पूजन' में तो शरीर का कोई विशेष उपयोग नहीं! इसीलिए, वास्तव में यहाँ भगवान का अभिप्राय द्विज, गुरु, प्राज्ञ और देवता की आरती उतारने-मात्र से या दूर से प्रणाम करने से नहीं, बल्कि उनके सक्रिय पूजन से है, उनकी विभिन्न प्रकार से यथोचित सेवा करने से है। यदि केवल मन में श्रद्धा रखी जाए, लेकिन उसका कोई व्यावहारिक शारीरिक रूप न हो, तो वह अपूर्ण मानी जाती है। शारीरिक पूजा के रूप देव-पूजा (ईश्वर की आराधना), मंदिर जाना, घर या मंदिर में मूर्ति का अभिषेक करना, दीप जलाना, फूल चढ़ाना, कीर्तन, होम, जप, व्रत-उपवास आदि। द्विज-पूजा (ब्राह्मणों का गुण धारण करने वाले और कर्म करने वालों का सम्मान): उन्हें को दान देना, भोजन करना, शास्त्र-पाठ सुनना, यज्ञ कराने पर उन्हें पर्याप्त दक्षिणा प्रदान करना। गुरु-पूजा : शिक्षक और मार्गदर्शकों का सम्मान, शारीरिक सेवा, उनके कार्यों में सहयोग प्रदान करना, चरण-स्पर्श करना, गुरु के उपदेशों को जीवन में अपनाना। प्राज्ञ-पूजा : उन्हें बैठने के लिए स्थान देना, उनके लिए जल और भोजन की व्यवस्था करना, विनम्रता से बातें करना, अन्य आवश्यक सेवा और सहयोग प्रदान करना । इन सब में शारीरिक कर्म सम्मिलित होते हैं, इसलिए इसे "शारीरिक तप" कहा गया है। भगवान का आशय "पूजन" के शारीरिक पक्ष पर विशेष जोर देना था, वरना अधकांश लोग यह कह कर कि उन्होंने उनकी मानसिक पूजा कर ली, यानी उन्हें श्रद्धा पूर्वक प्रणाम कर लिया, निवृत्त हो लेंगे।। 'शौच' का अर्थ सिर्फ सामान्य शारीरिक सफाई से नहीं, सक्रिय सफाई और शुद्धता से है। निरंतर 'शौच' या सफाई में निरत रहना भी शारीरिक सक्रियता की अपेक्षा रखता है। हिंसा में निश्चय ही शरीर का काफी उपयोग होता है मगर अहिंसा तो शरीर का प्रयोग नहीं करने से ही संभव होती है। शुरू में यह स्पष्टता नहीं आती कि भला 'अहिंसा' में शरीर का क्या उपयोग कि इसे 'शरीर के तप' में शामिल किया गया? यह बात हमें गहनतर चिंतन की ओर प्रेरित करती है। 'अहिंसा' शब्द-निर्माण की दृष्टि से निश्चय ही एक 'नकारात्मक' शब्द है, मगर अर्थ और विचार के स्तर पर इसे एक सकारात्मक रूप देने की आवश्यकता है जिसमें शरीर की भी सक्रियता हो। उदाहरण के लिए, अहिंसात्मक उपवास के द्वारा किसी को एक न्यायपूर्ण निर्णय लेने या अन्यायपूर्ण निर्णय को निरस्त करने के लिए नैतिक दबाव बनाने हेतु प्रयोग किया जा सकता है। ऐसे उद्देश्य प्राप्त करने के लिए व्यक्ति या संगठन हिंसा का ही अधिक प्रयोग करते हैं। लेकिन हमने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में देखा कि अहिंसात्मक उपवास का प्रयोग सरकार पर नैतिक दबाव बना कर अन्यायपूर्ण निर्णय निरस्त करवाने के लिए कैसे किया गया। साथ ही, अहिंसा में सेवा और पीड़ित को सांत्वना देना आदि भी शामिल करना भगवान का अभिप्राय है।


English

A note on "twice-born": "Dwija” means “one who is born for the second time.” The first birth is in the physical body, while the second birth is said to occur when a “knowledge body” is formed in the mind. This usually takes place after acquiring a great deal of learning in a hermitage school for an extended period, accompanied by the observance of celibacy (brahmacharya). It is this original “twice-born” or dwija that the Holy Gitā encourages us to revere. The second birth does not occur merely by donning the “sacred thread” (janeu or yagyopaveet) as later beliefs and practices may suggest. A note on "Guru": There is mention in the Bhāgawata Purāna of the kind of Guru one should seek to attain freedom from Māyā and reach Nirvāna—तस्माद्गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम् । शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम्॥ (Verse 21, Ch. 3, Eleventh Skandha, Bhāgawata Purāna). This means that spiritual seekers should take refuge in a Guru (spiritual guide) who is calm and composed, possesses profound scriptural knowledge, and has practical knowledge of God-the-Supreme and the means to attain Him. In today’s era, finding such a Guru has become exceedingly difficult. Therefore, it is wise to consider the Holy Gitā as the Guru and regularly study and seek guidance from her. Additionally, one can associate with spiritually knowledgeable and enlightened guides (Prāgya) who are systematically trained in the Holy Gitā and other relevant sacred texts. No human Guru can possess the kind of Knowledge found in the Bhagavad-Gitā. Furthermore, while the physical body of a human teacher may one day disappear, the Holy Gitā will always be available for spiritual guidance and blessings, serving as a conduit to Bhagawān Krishna Himself. A note on "Prāgyas": A Prāgya has nothing to do with the varna system (the four-fold classification of occupations and social strata). Anyone who is wise, learned, and enlightened can be considered a Prāgya, regardless of which traditional class (varna) they belong to. A word on celibacy: For unmarried renunciant monks (Sannyāsis), complete celibacy is recommended, while for married householders, maintaining a sexual relationship limited to one’s spouse is considered virtuous and as good as celibacy. There is a verse in the Manusmriti (3:45,50) that says, “one who is pleased and given to his own woman, .. that householder is also akin to a celibate,” emphasizing the importance of fidelity within marriage. In the Bhagavad-Gitā, it is mentioned that righteous and ethical sexuality is divine (7:11). However, even for married individuals, excessive obsession with sex is discouraged (2:70), and they are expected to abstain from sexual activity during holy fasts and other sacred occasions, as a part of their practice of celibacy.

Footnotes

^5 षोडशोपचार पूजन की 16 विधियाँ : आवाहनम् — देवता का आह्वान करना: “हे प्रभो! कृपया पधारें।” आसनम् — उन्हें आसन अर्पण करना: “आप इस आसन पर विराजें।” पाद्यम् — उनके चरण धोने के लिए जल अर्पण। अर्घ्यम् — स्वागत के लिए जल, पुष्प और चंदन मिश्रित अर्घ्य देना। आचमनम् — मुख प्रक्षालन (कुल्ला) के लिए जल अर्पण। स्नानम् — स्नान हेतु जल अर्पित करना (वास्तविक या मानसिक रूप से)। वस्त्रम् — वस्त्र अर्पण करना (प्रतीक स्वरूप भी हो सकता है)। यज्ञोपवीतम् — पवित्री (जनेऊ) अर्पण (अब इसकी आवश्यकता नहीं है)। गन्धः — चंदन या इत्र अर्पण करना। पुष्पम् — पुष्प अर्पण करना। धूपः — सुगंधित धूप दिखाना। दीपः — दीपक अर्पण करना (प्रकाश देना)। नैवेद्यम् — भोजन अर्पण करना। ताम्बूलम् — पान-सुपारी आदि अर्पण। नमस्कारः — साष्टांग प्रणाम करना। प्रार्थना / मन्त्रपुष्पाञ्जलिः — स्तुति, मंत्र और प्रार्थना द्वारा उपसंहार। विवेचना : इन 16 उपचारों का अभिप्राय यह नहीं है कि आज भी प्रत्येक औपचारिकता को अनिवार्य रूप से पूरा किया जाए। समय, स्थान और सामर्थ्य के अनुसार इनका पालन किया जा सकता है। मुख्य तत्व भावना और श्रद्धा है।