17:15श्रीभगवानुवाच

Shraddhatraya Vibhaga Yoga

श्रद्धात्रय विभाग योग

Sanskrit Shloka

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥ 17:15॥

Padacheeda (Word-by-Word)

अन्-उद्वेग-करम् वाक्यम्, सत्यम् प्रिय हितम् च यत्,स्व ध्याय-अभ्यसनम् च एव वाक्-मयम् तपः उच्यते।

Anvaya (Construction)

यत् (जो) अन्-उद्वेग-करम् (उद्वेग उत्पन्न न करने वाला), प्रिय-हितम् (प्रिय और हितकारी) च (और) सत्यम् (सत्य) वाक्यम् (वचन) च (और) स्वाध्याय-अभ्यसनम् (स्वाध्याय और अभ्यास) एव (ही) वाक्-मयम् (वचन से संबंधित) तपः (तप) उच्यते (कहा जाता है)।

Meaning

Hindi

जो उद्वेग न पैदा करने वाला प्रिय, हितकारी एवं सत्य भाषण है, तथा जो {धार्मिक-आध्यात्मिक और हितकारी साहित्य के} पढ़ने-लिखने का अभ्यास है, वे ही वाणी-संबंधी तप कहे जाते हैं।


English

Engaging in self-study, and speech that does not perturb others, is truthful, pleasant, and constructive, constitute austerity of the speech. (17:15)

Commentary

Hindi

वाणी का तप क्या होता है, यह श्रीकृष्ण के चरित्र से सीखना चाहिए। श्रीकृष्ण, अत्यंत उद्वेकारी परिस्थितियों में भी, सदा मधुर वचन ही बोलते थे, मधुर वाणी में ही बातें करते थे। उनके जीवन की सबसे उद्वेगकारी परिस्थितियों में से एक था युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के अवसर पर उपस्थित सैकड़ों राजाओं की उपस्थिति में शिशुपाल द्वारा युधिष्ठिर, भीम और भीष्म आदि के विरुद्ध लंबा रोषपूर्ण भाषण देना और श्रीकृष्ण के प्रति व्यक्तिगत रूप से अत्यंत अपमानजनक और कटु टिप्पणियाँ करना। लेकिन उस पूरे अमर्षपूर्ण लंबे वक्तव्य के बीच भी श्रीकृष्ण शांत रहे और अंत में, शिशुपाल का वध करने के पूर्व, शिशुपाल को अत्यंत मधुर और संयमित शब्दों में संबोधित करते हुए चेतावनी दी। महाभारत के सभा पर्व अंतर्गत शिशुपालवध पर्व में पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायःके श्लोक 4, 5 और 6 को देखें— "इस प्रकार कहकर क्रोध से भरा हुआ वह राजसिंह शिशुपाल गरजता हुआ युद्ध के लिए खड़ा हो गया। तब श्रीकृष्ण, जो वीरता में अग्रणी थे, उस शिशुपाल को देखकर अपने स्वजनों राजाओं से, जो वहाँ उपस्थित थे, मधुर वाणी में बोले— "राजाओ! यह सात्वतीपुत्र (शिशुपाल) हमारा परम शत्रु है। यह सात्वतों (यदुवंशी) का निन्दक और अहित करने वाला है। यह कभी भी कल्याण की बात नहीं करता," और इसके बाद, बिना जरा भी उद्विग्न हुए, उन्होंने शिशुपाल का वध कर दिया।^6 वाणी का तप क्या होता है, इसका एक और सुंदर निदर्शन श्रीराम की वाणी में मिलता है जो सदा अनुद्वेगकारी, सत्य किंतु प्रिय और हितकारी होती है। सीता स्वयंबर में जब महाक्रोधी और महाअहंकारी ऋषि परशुराम आ पहुंचते हैं और शिव-धनुष के भंग किए जाने पर दोषी को दंडित करने की घोषणा करते हैं, तब श्रीराम की संयमित और अनुद्वेगकारी वाणी देखिए और सुनिए–^7 अत्यंत क्रोध में भरकर परशुराम ने ये कठोर वचन बोले - "रे मूर्ख जनक! बता, ये धनुष किसने तोड़ा। उसे शीघ्र दिखा, नहीं तो रे मूर्ख! आज मैं जहाँ तक तेरा राज्य है, वहाँ तक की पृथ्वी उलट दूँगा!" परशुराम द्वारा ऐसे कई कठोर वचन बोलने के बाद श्रीराम का उत्तर देखिए– नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइही केउ एक दास तुम्हारा। अर्थात्, "हे नाथ, शिवधनुष भंग करने वाला आप का कोई दास ही होगा।" फिर परशुराम के लगातार क्रोध करने पर श्रीराम के ये वचन देखिए जो किसी के क्रोध को भी शांत कर दें, न कि उसे उद्विग्न कर उसका क्रोध और भड़का दें। परशुराम एक ऋषि थे, अतः उनका सम्मान करना और उनका क्रोध शांत करना श्रीराम का कर्तव्य था। इसीलिए उनके सभी कठोर वचनों का उत्तर श्रीराम ने शालीन और मृदुल वाणी में दिए— "हे नाथ, हमारी और आपकी बराबरी कैसी? कहाँ चरण और कहाँ मस्तक! कहाँ मेरा राम-मात्र छोटा-सा नाम और कहाँ आपका परशु-सहित बड़ा-सा नाम!" एक युवा राजपुत्र के लिए एक क्रोधी अहंकारी मुनि के क्रोध और अहंकार को शांत करने की यही उचित दवा थी। साथ ही, एक युवा राजपुत्र को अपनी और अपने कुल की गरिमा की भी रक्षा करनी थी, अपने रजोचित पराक्रम का भी ध्यान रखना था। अतः, जब परशुराम ने धमकाना और अहंकार दिखाना नहीं छोड़ा तो श्रीराम ने भी समुचित उत्तर बिना उद्दंडता या अहंकार प्रदर्शित किए दे ही दिया— "क्षत्रिय का शरीर धर कर जो युद्ध में डर गया, उस नीच ने अपने कुल पर कलंक लगा दिया। मैं स्वभाव से ही कहता हूँ, कुल की प्रशंसा करके नहीं, कि रघुवंशी रण में काल से भी नहीं डरते।" इस प्रकार वाणी के सौम्य तप से ही श्रीराम ने उग्र तप करने वाले परशुराम के क्रोध को शांत किया और स्थिति को अनुकूल बनाया, विवाह के पवित्र अवसर पर एक खूनी संघर्ष को टाला, और अपनी और अपने कुल की गरिमा भी बनाए रखी। फिर परशुराम को अपने स्वरूप का आभास दिला कर अपनी स्तुति करने, और फिर पराभूत हो कर बहिर्गमन करने को भी बाध्य किया। अतः वाणी का तप सीखना हो तो श्रीराम के चरित्र का अध्ययन करना चाहिए।

Footnotes

^6 इत्युक्त्वा राजशार्दूलः तस्थौ गर्जन्नमर्षणः। एवमुक्तस्ततः कृष्णः मृदुपूर्वमिदं वचः। उवाच पार्थिवान् स समक्षं स वीर्यवान्॥ एष नः शत्रुरत्यन्तं पार्थिवाः सात्वतीसुतः। सात्वतानां नृशंसात्मा न हितोऽनपकारिणाम्॥ (4-6, अध्याय 45, सभापर्व (शिशुपाल वधपर्व) महाभारत (गीता प्रेस) । ^7 रामचरितमानस, बालकांड, दोहा 267 से 284 तक।