Daivasura Sampad Vibhaga Yoga
दैवासुर सम्पद विभाग योग
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् । दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥ 16:2॥
अ-हिंसा, सत्यम्, अ-क्रोधः, त्यागः, शान्तिः, अ-पैशुनम्, दया भूतेषु, अ-लोलुप्त्वम्, मार्दवम्, ह्रीः, अ-चापलम्;
अ-हिंसा (अहिंसा), सत्यं (सत्य), अ-क्रोधः (क्रोध-मुक्ति), त्यागः (त्याग), शान्तिः (शांति), अ-पैशुनम् (द्वेषपूर्ण निंदा या चुगली से मुक्त रहना), भूतेषु (प्राणियों के प्रति) दया (दया), अ-लोलुप्त्वम् (लालच से रहित होना), मार्दवम् (मृदुता-सौम्यता), ह्रीः (लज्जा), अ-चापलम् (चंचलता से रहित होना);
Hindi
अहिंसा (मन, वाणी और शरीर से किसी प्रकार भी किसी को चोट नहीं पहुँचाना), सत्य {बोलना और सत्य का आदर करना}, क्रोध न करना, त्याग, शांति (मन को शांत और उद्वेग-रहित रखना और दूसरों को भी उद्विग्न और अशांत नहीं करना), किसी की भी निंदा-शिकायत न करना, सभी प्राणियों के प्रति दया, लोलुपता या लोभ से रहित होना, {स्वभाव और वाणी की} मृदुलता, लोक-लाज, अचापलता,
English
Non-violence, truthfulness (speaking and respecting the truth), absence of anger, willingness to sacrifice for others, inner peace (maintaining a calm mind and not disturbing the peace of others), refraining from speaking ill of others, compassion toward all beings, freedom from covetousness and greed, gentleness {in temperament and speech}, a sense of shame, and steadfastness; (16:2)
Hindi
"देवतालोग भी हृदय में तरह-तरह की कामनाएँ रख कर तरह-तरह की विपुल सामग्रियों से आपकी पूजा करते हैं तो भी आप उतने प्रसन्न नहीं होते जितने सभी प्राणियों पर दया करने से होते हैं"– ब्रह्मा द्वारा भगवान की स्तुति में कहा गया वाक्य (श्लोक 12, अ. 9, तृतीय स्कंध, भागवतपुराण)। सत्य : महाभारत के 'अनुशासनपर्व' के अंतर्गत 'दानधर्मपर्व' में भगवान शिव के मुख से यह कथन है—"जैसे नौका या जहाज समुद्र से पार होने का साधन हैं, वैसे ही सत्य स्वर्गलोक पहुँचने के लिए सीढ़ी का कार्य करता है। सत्य से बढ़ कर दान और तप भी नहीं हैं। जो जैसा सुना गया हो, जैसा देखा गया हो, और अपने द्वारा जैसा किया गया हो, उसे बिना परिवर्तन के वाणी के द्वारा प्रकट करना सत्य का लक्षण है"।^12 यह ध्यान रखना चाहिए कि जीतने भी जीवन मूल्य हैं वे सनातन अवश्य हैं, किंतु संपूर्ण रूप से स्थित निरपेक्ष नहीं। उदाहरण के लिए, महाभारत में सत्य के विषय में ही यह भी कहा गया है— "किसी निर्दोष (अन्य या स्वयं) के प्राण बचाने के लिये...झूठ बोल दिया जाय तो पाप नहीं लगता है।"^13 फिर, महाभारत में ही, यह कहा जाना कि " स एव धर्म: सोऽधर्मो देशकाले प्रतिष्ठित:" इस दिशा में भी संकेत देता है कि देश, काल और परिस्थिति के अनुसार धर्म कभी अधर्म और अधर्म कभी धर्म भी बन सकता है, यद्यपि यह कथन सिर्फ अपवादजनक परिस्थितियों की ओर ही संकेत करता है। ^14 सत्य की महिमा इसी से समझी जा सकती है कि महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास के द्वारा गांधारी को सौ पुत्रों का वरदान दिये जाने के बाद भी जब गांधारी का गर्भ निष्फल हो गया और मांस का एक लोथड़ा ही गर्भ से निकाला, तो गांधारी ने इसकी शिकायत महर्षि से की और अपना दुख और आश्चर्य प्रकट किया। इस पर महर्षि वेदव्यास ने गांधारी से यही कहा कि जीवन में कभी उन्होंने हास्य-विनोद में भी असत्य नहीं बोला है, इसलिए उनका वचन मिथ्या हो ही नहीं सकता। और तब उन्होंने उस मांस के लोथड़े से सौ पुत्र कैसे निर्मित होंगे, इसका उपाय भी सुझाया। और फिर गांधारी सौ पुत्रों की माता बनीं। इसी प्रकार, राजा परीक्षित को सात दिनों में मृत्यु का शाप देने के उपरांत जब शृंगी ऋषि को उनके पिता शमीक ऋषि ने क्षमाशील होने को कहा तो शृंगी ऋषि ने भी यही कहा कि जीवन में उन्होंने कभी हँसी-मजाक में भी झूठ नहीं बोला, इसलिए उनका वचन मिथ्या हो ही नहीं सकता, और परीक्षित की मृत्यु टल नहीं सकती। तो ऐसा होता है संपूर्ण सत्यनिष्ठा का प्रभाव।
^12 पृष्ठ 635, 36 षष्ठ खंड, महाभारत (गीता प्रेस) ^13 श्लोक 24, चौतीसवाँ अध्याय, राजधर्मानुशासनपर्व, शांतिपर्व, महाभारत। ^14 स एव धर्म: सोऽधर्मो देशकाले प्रतिष्ठित:। आदानमनृतं हिंसा धर्मो ह्यावस्थिक: स्मृत: ।। ११ ।। एक ही क्रिया देश और काल के भे दसे धर्म या अधर्म हो जाती है! चोरी करना, झूठ बोलना एवं हिंसा करना आदि अधर्म भी अवस्थाविशेष में धर्म माने गये हैं। ११ ।। (महाभारत, शांति पर्व, राजधर्मानुशासनपर्व, छत्तीसवाँ अध्याय, श्लोक ११)