16:1श्रीभगवानुवाच

Daivasura Sampad Vibhaga Yoga

दैवासुर सम्पद विभाग योग

Sanskrit Shloka

अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः । दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥ 16:1॥

Padacheeda (Word-by-Word)

अ-भयम् सत्त्व-संशुद्धिः ज्ञान-योग-वि-अवस्थितिः, दानम्, दमः च, यज्ञः च, स्वाध्यायः, तपः, आर्जवम् ;

Anvaya (Construction)

अ-भयम् (निर्भयता), सत्त्व-संशुद्धिः (सत्व की शुद्धता), ज्ञान-योग-वि-अवस्थितिः (ज्ञान और योग में स्थित होना) च (और) दानम् (दान), दमः (इंद्रिय-संयम), यज्ञः (यज्ञ), स्वाध्यायः (स्वाध्याय), तपः (तपस्या), च (और) आर्जवम् (सरलता)।

Meaning

Hindi

भय का अभाव, अंतःकरण की पूर्ण शुद्धि, तत्त्व-ज्ञान में निरंतर स्थित रहना और इंद्रियों का नियंत्रण, दान, यज्ञ, तप, शास्त्रों का अध्ययन या {पढ़ना-लिखना नहीं जानने पर, या यों भी} दूसरों से पढ़वाकर सुनना और मन की सरलता-निष्कपटता;


English

Fearlessness, purity of character, remaining firmly anchored in spiritual Knowledge, charity, subjugation of the senses and performance of yajna (spiritual pursuits), self-study {of scriptures}, austerity and uprightness, (16:1)

Commentary

Hindi

भय और अभय : भय कई प्रकार के होते हैं और भय के कई कारण होते हैं। भय से जीवन की गुणवत्ता नष्ट होती है। कुछ लोगों को यों ही अनिष्ट की शंका सताती रहती है कि पता नहीं अब कौन-सा अनिष्ट होने वाला है। यह अनिष्ट का भय भी एक भय होता है। भगवद्-गीता के सिद्धांतों की समझदारी, अर्थात ज्ञान से, और भगवान में आस्था दृढ़ होने से, यह भय चला जाता है। शत्रुओं का भय भी एक भय होता है। अगर आपने अपने अन्याय पूर्ण व्यवहार के कारण शत्रु खड़े किए हैं तो स्मरण रखें भगवान ने इसी अध्याय में "अन्याय" को एक असुरी गुण माना है।^1 किसी से शत्रुता हो तो उसे खत्म करने के उपाय सोचें, मिल बैठ कर, मध्यस्थता करवा कर, शुद्ध स्वार्थ से ऊपर उठकर, अहंकार और क्रोध त्याग कर, न्यायपूर्ण निर्णय ले कर, शत्रुता को खत्म करें।। इससे शत्रु द्वारा प्रहार का भय जाता रहेगा। मृत्यु का भय ज्ञान और आस्था से मृत्यु का भय चला जाता है। गैरकानूनी या अन्य गलत काम करने वालों को पकड़े जाने का भय लगा रहता है, मगर इस अध्याय में बताए गए दैवी गुणों (दैवी संपदा) से संपन्न लोग गलत काम नहीं करते, इसलिए भी निर्भय रहते हैं, पकड़े जाने और दंडित होने का भय चला जाता है।। नरक का भय भी एक बड़ा भय होता है। पाप करने वालों को यह भय विशेष सताता रहता है। इसलिए, पाप कर्मों से बचना चाहिए। कुछ लोगों को भगवान से भी भय लगता है। किंतु भगवान ने गीता में कहा है कि वे सभी के माता भी हैं और पिता भी^2 । वे सभी के सुहृद् यानी मित्र भी हैं^3 । तो फिर माता, पिता और मित्र से क्या भय? यदि हमने पूर्व में पाप कर्म किए हैं तो उनके फल भोगने को तैयार रहें, प्रचुर पुण्य कर्मों से पूर्व पाप कर्मों को संतुलित और नष्ट करें, और पुण्य कर्मों से अपनी झोली भर कर ईश्वर की अनन्य भक्ति करते हुए अपने योगक्षेम का वहन उनपर छोड़ दें और निर्भय हो जाएँ। भगवान ने तो कहा ही है कि पापी से पापी व्यक्ति को भी वे नष्ट होने से बचा लेते हैं यदि वह उनकी शरण में आ कर धर्मात्मा बन जाता है^4 । भय एक ऐसी भावना है जिसकी अधिकता मनुष्य के सुख-चैन को नष्ट कर देती हैं। भय सिर्फ अधर्म करने से होना चाहिए। भगवान तो हमें आनंद में देखना चाहते हैं। और आनंद से रहने के लिए हमें भय से मुक्त देखना चाहते हैं। और भय से मुक्त होने के लिए हमें भय के कारणों को दूर करना होगा। तभी हम "अभय" के दैवी गुण को प्राप्त कर पायेंगे। अभय प्राप्त करने के लिए हमें दिव्य बनना पड़ेगा। सत्त्व-संशुद्धि : सत्त्व-संशुद्धि या अंतःकरण की शुद्धि के लिए संतों का संग अर्थात सत्संग एक अत्यंत उत्तम तरीका है। रा.च.मा. बालकांड के 1:3 से 3: (ख) तक इसका सुंदर वर्णन है, उसे जरूर देखें। आज-कल ऑनलाइन अच्छे सत्संग समूहों को जॉइन कर उनका भी लाभ सत्संग के लिए उठाया जा सकता है। अच्छा हो यदि आप इस पुस्तक में दिये गये आत्म-समीक्षा उपकरणों (प्रश्नावलियों)^5 का उपयोग समय-समय पर करते हुए आत्म-समीक्षा करते रहें और इस पुस्तक के प्रथम खंड में भावना-संदर्शिका 2 में दी गई सकारात्मक भावनाओं को बढ़ायें और भावना-संदर्शिका 3 में प्रदत्त नकारात्मक भावनाओं को दूर करने का सतत प्रयास करते रहें। एक-एक कर के भावों को प्रयासपूर्वक शुद्ध करें। भगवान ने आगे 17 वें अध्याय में भाव-संशुद्धि की आवश्यकता पर जोर दिया है और इसे "मन का तप" माना है^6 । तप, भगवान के अनुसार, सभी के लिए अनिवार्य है^7। इसी भाव-संशुद्धि से क्रमशः पूर्ण अंतःकरण की शुद्धि हो जाती है, यानी सत्त्व-संशुद्धि हो जाती है। यज्ञ : यज्ञ का अर्थ सिर्फ या अनिवार्य रूप से अग्नि में हवन-सामग्री डालने वाले यज्ञ से न लें। यज्ञ के अर्थ के लिए श्लोक 4:24-33 देखें। वैदिक अग्नि-यज्ञों को भगवान ने अधिक महत्त्व नहीं दिया है। तप : "तप" की बात होते ही हमारी आँखों के सामने एक पैर पर खड़े होकर बिना अन्न-जल के वर्षों तक शरीर को कृश करते हुए तपस्या करने वाले ऋषियों या मनोकामना-पूर्ति चाहने वाले तपस्वियों की छवि सामने आ जाती है। यह वैदिक और पौराणिक तप की छवि है। वैदिक और पौराणिक साहित्य तथा इतिहास अर्थात रामायण-महाभारत में भी तप की बड़ी महिमा बतायी गई है। लेकिन वह तप अलग था। गीता का तप बिकुल अलग है। भगवान के इस प्रकार के आत्म-पीड़क तप को अवांछनीय और "तामस तप" बता दिया है जिसमें शरीर को अधिक कष्ट दिया जाता हो (17:19)। कुछ मामलों में तो उन्होंने इस प्रकार के शरीर को पीड़ा पहुँचाने वाले तपों को "आसुरी" तप भी करार दिया है, जब वे दंभ और अहंकार से युक्त रहते हैं (17:5, 6), जैसे रावण-सदृश असुरों का तप। गीता में भगवान ने तप की परिभाषा ही बदल दी है। गीता में "तप" के अर्थ के लिए विशेष रूप से श्लोक 17:14-19, 28 देखें। इसमें कहीं भी, कोई भी, आत्म पीड़क तप नहीं है। जो तीन प्रकार के तप भगवान ने सबों के लिए अनिवार्य कर दिए वे लंबे समय तक अपने को कठोर कष्ट दे कर मनोकामना-पूर्ति अथवा कुछ आध्यात्मिक शक्तियाँ और 'शापित' करने की सामर्थ्य अर्जित करने वाले तपों से नितांत भिन्न हैं। वैदिक और पौराणिक धराओं में आत्म-पीड़क "तपस्वी" बड़ी संख्या में मिलते हैं, जो शरीर को लंबे समय तक शरीर को कृश करके आध्यात्मिक तेज और सिद्धियाँ प्राप्त करते थे। ऐसे तप करने वालों में एक प्रतिदर्श विश्वामित्र ऋषि भी थे, जिन्हें लोग जानते हैं। उन्होंने भी घोर तप किया किंतु वशिष्ठ ऋषि के निर्दोष पुत्रों की हत्या व्यक्तिगत कारणों से बदला लेने की भावना से क्रोधवश कर डाली। इस प्रकार के वैदिक तप में में क्रोध, अहंकार, बदले की भावना आदि का नाश हो, ऐसा अनिवार्य नहीं था, ऐसा ही विवरणों से प्रतीत होता है, यद्यपि अक्रोधी और निरहंकारी तपस्वी भी मिल जाते हैं। तपोबल के अहंकार में विश्वामित्र ने एक नयी सृष्टि भी करनी चाही, त्रिशंकु को स्वर्ग भेजने पर भी अड़े रहे। यह सब गहन अहंकार की ही अभिव्यक्तियाँ थीं। विश्वामित्र इस प्रकार के तप के एक एकमात्र उदाहरण नहीं हैं। दुर्वसा ऋषि भी एक उदाहरण हैं, जो तपोबल की धनी थे मगर इतने अहंकारी और क्रोधी थे कि बात-बात में क्रोध करते और शाप देते फिरते थे। महापराक्रमी परशुराम भी ऐसे ही ऋषियों में एक थे। महाभारत में अभिमन्यु के पुत्र धर्मात्मा राजा परीक्षित को अपने पिता ऋषि शमीक के प्रति एक छोटी-सी भूल के लिए शमीक के पुत्र शृंगी ऋषि ने अपने तपोबल के अहंकार में, क्रोध में भर कर, बिना उचित विचार किए ही, सात दिनों के भीतर सर्पदंश से राजा के मर जाने का शाप दे दिया। और चूँकि उनके पास कठोर तपस्या और सदा सत्य बोलने का बल था, इसलिके उनका कथन मिथ्या नहीं हो सकता था, ऐसे स्वयं वे मानते और कहते थे; और, वास्तव में राजा परीक्षित की सर्पदंश से सात दिनों में मृत्यु हो गई। उल्लिखित ऋषियों द्वारा किया गया "तप" वह तप नहीं था जो भगवान गीता में श्लोक 17 में श्लोक 14, 15, 16 में बताते हैं^8 । धरातल पर वैदिक संस्कृति जिस प्रकार विकसित हुई थी उसका एक सटीक उदाहरण महाभारत के आदि पर्व में मिलता है जहां पाण्डवों के पूर्वज, भरतवंश के श्रोत, राजा भरत के जन्म-स्थल महर्षि कण्व के आश्रम का चित्रण मिलता है, जो तप या वैदिक तपस्या की संस्कृति को इस प्रकार दर्शाता है— "उनके आश्रम में बहुत से ऐसे मुनि रहते थे जो जल पीकर, वायु पीकर अथवा सूखे पत्ते खाकर तपस्या करते थे। फल-मूल खाकर रहने वाले भी बहुत थे। वह सब के सब जितेन्द्रिय एवं दुर्बल शरीर वाले थे। उनके शरीर की नस-नाड़ियां स्पष्ट दिखाई देती थीं। उत्तम व्रत का पालन करने वाले उन महर्षियों में से कितने ही सिर पर जटा धारण करते थे और कितने ही सर मुड़े रहते थे । कोई वल्कल धारण करते थे और कोई मृगचर्म लपेटे रहते थे"।^9 अर्थात शरीर को कृश करने वाली तपस्या तो वैदिक संस्कृति के एकीकृत अंग थी। देखिए, महर्षि कण्व का आश्रम कैसा था उस अत्यंत प्राचीन काल में जब भरत की माता शकुंतला वहाँ रहती थी— "राजा दुष्यंत जब महर्षि कण्व के आश्रम में गए तो उन्होंने जो आश्रम देखा वह उनकी कल्पना के ब्रह्मलोक के समान लगा क्योंकि "श्रेष्ठ ऋग्वेदी ब्राह्मण पद और क्रमपूर्वक ऋचाओं का पाठ कर रहे थे। नरश्रेष्ठ दुष्यंत ने अनेक प्रकार के यज्ञ संबंधी कर्मों में पढ़ी जाती हुई वैदिक ऋचाओं को सुना। यज्ञ विद्या और उसके अंगों की जानकारी रखने वाले यजुर्वेदी विद्वान भी आश्रम की शोभा बढ़ा रहे थे। नियम पूर्वक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने वाले सामवेदी महर्षियों द्वारा वहां मधुर स्वर से सामवेद का गान किया जा रहा था। मन को संयम में रखकर नियम पूर्वक उत्तम व्रत का पालन करने वाले सामवेदी और अथर्ववेदी महर्षि भारुंडसंज्ञक साम मंत्रों के गीत गाते और अथर्ववेद के मंत्रों का उच्चारण करते थे, जिससे उस आश्रम की बड़ी शोभा होती थी"।^10 आत्मपीड़क तप वैदिक संस्कृति का अंग जरूर थे लेकिन यह तात्पर्य नहीं है कि वेद तपस्वियों को क्रोधी और अहंकारी होने को कहते थे, या बात-बात में लोगों को शापित करने को कहते थे। लेकिन तपों के सात्त्विक, राजस और तामस वर्गीकरण और भाव-संशुद्धि तथा सत्त्व-संशुद्धि पर गीता के वचनों जैसी स्पष्टता वेदों-पुराणों में नहीं दिखती। जहाँ है भी, तो भी तो ढेर सारी बातों के बीच वे बातें खो जाती हैं। सुदृढ़ता से उनका संप्रेषण नहीं हो पाता। भगवद्-गीता इन विषयों में कोई संदेह नहीं छोड़ती। वाणी के तप के बारे में भगवान का यह कहना है कि सत्य वचन बोलें मगर प्रिय तरीके से और हितकारी उद्देश्य से। भगवान का मूल वचन देखें— अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥ 17:15॥ "जो उद्वेग न पैदा करने वाला प्रिय, हितकारी एवं सत्य भाषण है, तथा जो {धार्मिक-आध्यात्मिक और हितकारी साहित्य के} पढ़ने-लिखने का अभ्यास है, वे ही वाणी-संबंधी तप कहे जाते हैं। "तप" को परिभाषित करते समय ही "वाणी के तप" को इस प्रकार स्पष्ट कर देने से तपस्वियों द्वारा बात-बात में शापित करने वाली वाणी बोलने का स्पष्ट निषेध कर दिया। क्रोध को आसुरी गुण बता कर बात-बात में क्रोध करने से तपस्वियों-सहित सभी को एक सीख दी गई। निरहंकारी और क्षमाशील को अपना प्रिय बता कर दुर्वासा, विश्वामित्र, परशुराम और शृंगी जैसे ऋषि भविष्य में निर्मित न हों, इसकी भी व्यवस्था उन्होंने कर दी।^11 स्वाध्याय : भगवान ने यह तो बता दिया कि स्वाध्याय एक दैवी गुण है, मगर प्रश्न यह उठता है कि किन शास्त्रों या ग्रंथों का स्वाध्याय करें? शास्त्र असंख्य हैं, और उन सभी का स्वाध्याय करने से एक सामान्य साधक को मति-भ्रम या संशय हो जाने की संभावना है, भले ही उद्भट विद्वानों को न हो। भगवान पहले ही इस विषय में सचेत कर चुके हैं कि मतिभ्रम या संशय से अपना नाश ही होता है। इसलिए गीता-शास्त्र का नित्य स्वाध्याय करें और हृदयंगम करें। आधारभूत शास्त्र एक ही को मानें—भगवद्-गीता को—बाकी सभी को पूरक ग्रंथों के रूप में स्वीकारें। ज्ञान-योग के साधक पूरक ग्रंथों के रूप में मुख्यतः उपनिषद तथा ब्रह्मसूत्र, ध्यानयोग के साधक पातंजल योगसूत्र और भगवती शक्ति के उपासक दुर्गा-सप्तशती आदि का अनुशीलन भी कर सकते हैं। किंतु भक्ति-योगियों-सहित सभी को पूरक-ग्रंथों के रूप में रामचरितमानस और भागवत-पुराण का अवश्य अनुशीलन करना चाहिए। सिर्फ इतना ध्यान रहे कि चतुर लोगों ने इन सभी ग्रंथों में अपने कुछ निकृष्ट या विचित्र मतों को क्षेपक के रूप में कहीं-कहीं घुसा दिया है। इसलिए जिस किसी भी ग्रंथ में भगवद्-गीता के वचनों या भगवद्-गीता की भावना के विरुद्ध मत मिलें, उन अंशों को ग्रहण नहीं करें। आर्जवम् : आर्जवम् शब्द "ऋजु" से बना है। "ऋजु" का अर्थ है, "सीधा, सरल, ईमानदार, निष्कपट।" ऋजु का उलटा है तिर्यक। तिर्यक का अर्थ है, "आड़ा, टेढ़ा, विक्षिप्त"। कुटिल, कपटी, वक्र आदि ऋजु के अन्य विपरीत अर्थ वाले शब्द हैं।


English

A note on the study of scriptures: In the vast array of Hindu scriptures, it can be overwhelming for an ordinary seeker to navigate them all, potentially leading to confusion. Therefore, it is often considered most beneficial to focus on an in-depth and comprehensive understanding of a single scripture—the Bhagavad-Gitā, regarded as God’s direct and true Word. Supplementary scriptures like the Rām-charit-mānas by the poet-saint Tulasidāsa and the Bhāgawata Purāna can be useful for further insights. However, it's wise to approach both holy books with discernment, disregarding any statements that don't align with the essence and purpose of the Bhagavad-Gitā. In certain editions of the Rām-charit-mānas, there may be derogatory remarks about Shudras and women, which should be disregarded as they don't resonate with the teachings of the Gitā. Additionally, some sections suggesting polytheism might not adhere to the principles of the Gitā and can be approached with caution. A note on charity and alms giving: Please refer to verses 17:7, 20, 21, and 22 for a deeper understanding of the principles related to charity, almsgiving, and benefaction activities discussed in these verses. A word on "yajna": The term “yajna” should not be narrowly interpreted as the sacrificial fire-ceremony involving offerings into the holy fire. For a comprehensive understanding of the concept of yajna and its different forms, please refer to verses 4:24-33, which provide insights into its various meanings and manifestations. Regarding "Tapa" or austerity: Verses 17:14-19, 28 provide insight into the meaning of "Tapa." It should not be interpreted solely in the traditional sense of self-torture for spiritual gain.

Footnotes

^1 आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः। ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्॥ 16:12॥ ^2 पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः। वेद्यं पवित्रमोङ्कार ॠक्साम यजुरेव च।। 9:17 ^3 गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्। प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्।। 9:18 ^4अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः।। 9:30 क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति। कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तःप्रणश्यति।। 9:31 ^5 इस पुस्तक के पृष्ठ 11 पर इन प्रश्नावलियों की सूची देखें। ^6 मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः। भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥ 17:16 ^7 यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् । यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥ 18:5॥ ^8 देवता, द्विज, गुरु और प्राज्ञजनों (प्रज्ञावान या ज्ञानवान जनों) का पूजन, शरीर को स्वच्छ रखना, सरल-सादा जीवन, ब्रह्मचर्य और अहिंसा — यह शरीर-का तप कहा जाता है (17:14)। जो उद्वेग न पैदा करने वाला, प्रिय, हितकारी एवं सत्य भाषण है, तथा {धार्मिक-आध्यात्मिक और हितकारी साहित्य के} पढ़ने-लिखने का अभ्यास है — वे ही वाणी-संबंधी तप कहे जाते हैं (17:15)। मन की प्रसन्नता, सौम्यता, मौन, मन का नियंत्रण और भावनाओं की शुद्धि — यह मन-संबंधी तप कहा जाता है (17:16)। ^9 महाभारत, प्रथम खंड, पृष्ठ 263, आदि पर्व, संभव पर्व, चतुःसप्ततितमोऽद्यायः (गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित (संवत 2072, सत्रहवाँ पुनर्मुद्रण)। ^10 वही, पृष्ठ 248 । ^11 अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥ 12:13॥ सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥ 12:14॥