Purushottama Yoga
पुरुषोत्तम योग
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्। विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥ 15:10॥
उत्क्रामन्तम्, स्थितम्, वा अपि भुञ्जानम्, वा गुण-अन्वितम्; वि-मूढा: न अनु-पश्यन्ति, पश्यन्ति ज्ञान-चक्षुषः ।।
उत्क्रामन्तम् (ऊपर जाते हुए) वा (या) स्थितम् (स्थित हुए) वा (या) भुञ्जानम् (भोगते हुए) गुण-अन्वितम् (गुणों से युक्त हुए को) अपि (भी) वि-मूढाः (विवेकहीन जन) न (नहीं) अनु-पश्यन्ति (देखते हैं); ज्ञान-चक्षुषः (ज्ञान दृष्टि वाले) पश्यन्ति (देखते हैं)।
Hindi
{शरीर से} निकल जाने वाले को अथवा {शरीर में} रहने वाले को—गुणों से युक्त होकर भोग करने वाले को—अज्ञानी लोग नहीं जानते, मगर ज्ञान के नेत्रों से देखने वाले लोग उसे पहचानते हैं।
English
The one who lives in the body or leaves it, and enjoys {the objects of the senses} under the spell cast by the Modes of Nature is not observed by the ignorant. The enlightened ones, however, recognize it with the eyes of wisdom. (15:10)