Purushottama Yoga
पुरुषोत्तम योग
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्। यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः॥ 15:11॥
यतन्तः योगिनः च एनम् पश्यन्ति आत्मनि अव-स्थितम्; यतन्तः अपि अकृत-आत्मानः न एनम् पश्यन्ति, अ-चेतसः।
यतन्तः (प्रयत्न करते हुए) योगिनः (योगी) आत्मनि (आत्मा में) अवस्थितम् (स्थित) एनम् (इसे) पश्यन्ति (देखते हैं) च (और) अकृत-आत्मानः (अशुद्ध आत्म वाले) अ-चेतसः (अज्ञानी जन) यतन्तः (प्रयत्न करते हुए) अपि (भी) एनम् (इसे) न (नहीं) पश्यन्ति (देखते हैं)।
Hindi
प्रयत्न करने वाले योगीजन अपने अंदर अवस्थित इस {आत्मा} को देखते हैं, किंतु जिन्होंने अपने अंतःकरण को शुद्ध नहीं किया है, ऐसे अज्ञानीजन यत्न करते रहने पर भी इस आत्मा को नहीं जान पाते।
English
Spiritual seekers who earnestly strive can realize the presence of this soul within themselves. But those whose conscience remains unpurified and tainted by ignorance may struggle to perceive this soul, even with dedicated effort. (15:11)