Gunatraya Vibhaga Yoga
गुणत्रय विभाग योग
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः। निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥ 14:5॥
सत्त्वम् रजः तमः इति गुणाः प्रकृति-सम्भवाः, नि-बध्नन्ति महा-बाहो देहे देहिनम् अ-व्ययम्।
महा-बाहो (हे महाबाहो)! सत्त्वम् (सत्त्व), रजः (रजस), तमः (तमस), इति (ये) प्रकृति-सम्भवाः (प्रकृति से उत्पन्न) गुणाः (गुण) अ-व्ययम् (अविनाशी) देहिनम् (देहधारी को) देहे (देह में) नि-बध्नन्ति (बाँधते हैं)।
Hindi
हे महाबाहु अर्जुन! सत्त्व, रज और तम, प्रकृति से उत्पन्न ये तीनों गुण देही को अर्थात सनातन आत्मा को देह के साथ बाँध देते हैं।
English
O Mighty-armed Arjuna, the three attributes of Sattva, Rajas, and Tamas, which emanate from Nature, bind the soul, the master of the body, to the physical form. (14:5)
Hindi
गुण निश्चय ही देही को देह में बाँधते हैं, मगर परमेश्वर की सृष्टिलीला के क्रम में वास्तव में आत्मा स्वयं ही उन्हें आकर्षित कर, उनमें बँधने आती है (15:7)।
English
The Gunas indeed bind the soul to the body, but in the order of God’s Creation, the soul itself initially attracts the elements of the body under formation and volunteers to be bound by them. (15:7)