Gunatraya Vibhaga Yoga
गुणत्रय विभाग योग
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥ 14:4॥
सर्व-योनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्-भवन्ति याः, तासाम् ब्रह्म महत् योनिः, अहम् बीजप्रदः पिता।
कौन्तेय (हे कुंतीपुत्र)! सर्व-योनिषु (सभी योनियों में) याः (जो) मूर्तयः (रूप) सम्-भवन्ति (उत्पन्न होते हैं) महत् ब्रह्म (प्रकृति) तासाम् (उनकी) योनिः (गर्भ है) अहम् (मैं) बीजप्रदः (बीज देने वाला) पिता (पिता हूँ)।
Hindi
हे अर्जुन! सभी योनियों या जीव-कोटियों में जितनी मूर्तियाँ अर्थात शरीरधारी प्राणी उत्पन्न होते हैं, प्रकृति तो उन सबके जन्म का स्रोत है, और मैं {उस योनि में प्राणियों का} बीज प्रदान करने वाला पिता हूँ।
English
Thus, O, Arjuna, of all the bodily beings born in different species, the Unmanifest Nature is the womb (Mother), and I am the impregnating Father! (14:4)