Gunatraya Vibhaga Yoga
गुणत्रय विभाग योग
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः। सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते॥ 14:25॥
मान-अप-मानयोः तुल्यः, तुल्यः मित्र-अरि-पक्षयोः, सर्व-आरम्भ-परि-त्यागी, गुण-अतीतः सः उच्यते।
मान-अप-मानयोः (जो सम्मान और अपमान में) तुल्यः (समान है), मित्र-अरि-पक्षयोः (मित्र और शत्रु के पक्ष में) तुल्यः (समान है), सर्व-आरम्भ-परि-त्यागी (सभी कार्यों के आरंभ में कर्तापन के अहंकार से मुक्त है), सः (वह) गुण-अतीतः (गुणों से परे) उच्यते (कहा जाता है)।
Hindi
जो मान और अपमान में सम हो, मित्र और वैरी-पक्ष में भी सम हो एवं सारे कार्यों के आरंभ में कामना-रहित और कर्तापन के अभिमान से रहित बना रहता हो, वह प्रकृति के तीनों गुणों से ऊपर उठा हुआ कहा जाता है।
English
The one who remains equanimous in the face of honor and insult, treats friends and foes alike, initiates actions without attachment to outcomes and a sense of agency or doership, is said to have risen above the three Modes of Nature. (14:25)