Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga
क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु। नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥ 13:9॥
असक्तिः, अन्-अभिष्वंङ्गः, पुत्र-दार-गृह-आदिषु, नित्यम् च सम-चित्तत्वम्, इष्ट-अ-निष्ट-उप-पत्तिषु।
पुत्र-दार-गृह-आदिषु (पुत्र, पत्नी, घर आदि में) असक्तिः (आसक्ति का अभाव), अन्-अभिष्वंङ्गः (अ-संलग्नता), च (और), इष्ट-अनिष्ट-उप-पत्तिषु (इच्छित और अनिच्छित परिणामों में) नित्यम् (सदैव) सम-चित्तत्वम् (सम-चित्तता),
Hindi
पुत्र-दार-घर आदि में आसक्ति का अभाव तथा इच्छित और अवांछित (जिसे प्राप्त करने की इच्छा नहीं हो) इन दोनों ही की प्राप्ति में सदा ही चित्त का सम रहना,
English
Absence of attachment, freedom from excessive involvement in family, home, and the like, and a continuing even-mindedness toward situations favorable and adverse; (13:9)
Hindi
'दार' या 'दारा' का अर्थ स्त्री होता है। यह पूछा जा सकता है कि क्या यह पुरुष-प्रधान दृष्टि नहीं हुई? पुरुष को स्त्री से आसक्ति नहीं रखनी चाहिए, मगर क्या स्त्री को पुरुष के प्रति आसक्त रहना चाहिए? ध्यान रहे कि संस्कृत में अंग्रेज़ी शब्द "स्पाउज़" (spouse), जिसका मतलब होता है "पति या पत्नी", का कोई सटीक समानार्थी शब्द अधिक प्रचलन में नहीं है। लेकिन यहाँ 'दार' से 'पति-या-पत्नी' या "स्पाउज़" का ही अर्थ लेना चाहिए—वैसे ही जैसे इस श्लोक में 'पुत्र' से 'पुत्र और पुत्री' दोनों का अर्थ लेना उचित होगा, अन्यथा किसी विचक्षण व्यक्ति द्वारा यह मतलब निकाले जाने की संभावना बनी रहेगी कि भगवान पुत्र में तो अनासक्त रहने को कह रहे हैं, मगर पुत्री में आसक्ति से उन्हें कोई परहेज नहीं। दो बातों का ध्यान रखा जाए— एक तो यह कि 'प्रेम' ('प्रीति') और 'आसक्ति' के फ़र्क को न भूला जाए, क्योंकि भगवान सबों से प्रेम करने के पक्ष में हैं, लेकिन सिवाय ईश्वर के किसी अन्य में 'आसक्ति' रखने के विरुद्ध हैं; दूसरी बात यह कि यह अध्याय संन्यासियों-ज्ञानमार्गियों के लिए विशेष रूप से कहा गया है। संन्यासी अगर पुरुष है तो स्त्रियों से, और अगर स्त्री है तो पुरुषों से विशेष रूप से अलग और अनासक्त रहे—यह आशय भी है। अगर ज्ञानी गृहस्थ है तो 'पुत्र/पुत्री' और 'पति/पत्नी' से प्रेम करता हुआ भी अनासक्त रहे।