11:52श्रीभगवानुवाच

Vishwarupa Darshana Yoga

विश्वरूप दर्शन योग

Sanskrit Shloka

सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम । देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः॥ 11:52॥

Padacheeda (Word-by-Word)

सु-दुर्दर्शम् इदम् रूपम् दृष्टवान् असि यत् मम; देवाः अपि अस्य रूपस्य नित्यम् दर्शन-काङ्क्षिणः।

Anvaya (Construction)

मम (मेरा) यत् (जो) रूपम् (रूप) दृष्टवान् (देखा) असि (है), इदम् (यह) सु-दुर्दर्शम् (अत्यंत दुर्लभ है)। देवाः (देवतागण) अपि (भी) नित्यम् (सदैव) अस्य (इस) रूपस्य (रूप के) दर्शन-काङ्क्षिणः (दर्शन की इच्छा रखते हैं)।

Meaning

Hindi

मेरा यह रूप, जिसे तुमने देखा है, देखने को मिलना अति दुर्लभ है। देवतागण भी सदा इस रूप के दर्शनों के इच्छुक रहते हैं।


English

The form you witnessed of Mine is exceedingly rare and coveted even by the gods themselves. (11:52)

Commentary

Hindi

False


English

अर्जुन ने पिछले कुछ क्षणों में भगवान के तीन रूप देखे। अभी वह उनका मानवीय द्विभुज रूप देख रहा है। इसके ठीक पूर्व उसने उनका चतुर्भुज रूप देखा। और उसके भी पहले उसने भगवान का विश्वरूप देखा। इस श्लोक में भगवान किस रूप की बात कर रहे हैं, यह स्पष्ट नहीं है। श्रीकृष्ण को केंद्र में रखने वाले महात्मा इस 'सुदुर्दर्श' रूप को श्रीकृष्ण रूप मानते हैं, जो उस समय तो विरल दर्शनों वाला रूप नहीं था, किन्तु श्रीकृष्ण के धरती से विलुप्त हो जाने के बाद अत्यंत विरल दर्शनों वाला रूप हो गया। जो विद्वान श्रीविष्णु को केंद्र में रखते हैं, वे चतुर्भुज रूप को वह 'सुदुर्दर्श' रूप मानते हैं। अन्य विद्वान भगवान के विश्वरूप को ही वह 'सुदुर्दर्श' रूप मानते हैं, जिसका संकेत श्लोक 11:48 में भगवान पहले ही कर चुके हैं। वास्तव में, ये तीनों ही रूप मनुष्यों और देवताओं के लिए अत्यन्त 'सुदुर्दर्श' हैं। इसी प्रकार भगवान नारायण के महान अवतार श्रीराम का रूप भी इसी 'सुदुर्दर्श' कोटि में पड़ेगा। ये सभी रूप भगवान के सगुण रूप ही हैं। दृश्यमान होने के कारण विश्वरूप भी सगुण रूप ही कहलाएगा। दर्शन तो 'सगुण' रूप के ही होते हैं या हो सकते हैं। निर्गुण–निराकार रूप तो दर्शनीय है ही नहीं — उसकी तो रहस्यमयी अनुभूतियाँ ही हो सकती हैं।