Vishwarupa Darshana Yoga
विश्वरूप दर्शन योग
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् । व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य॥ 11:49॥
मा ते व्यथा, मा च विमूढ-भावः, दृष्ट्वा रूपम् घोरम् ईदृक् मम इदम्; व्यपेत-भीः प्रीत-मनाः पुनः त्वम् तत्-एव मे रूपम् इदम् प्र-पश्य।
मम (मेरा) ईदृक् (इस प्रकार का) इदम् (यह) घोरम् (भयंकर) रूपम् (रूप) दृष्ट्वा (देखकर) ते (तुम्हें) व्यथा (दुःख) मा (नहीं हो) च (और)विमूढ-भावः (अज्ञानी की तरह, भ्रमित होने का भाव) मा (नहीं हो); त्वम् (तुम) व्यपेत-भीः (भय को त्याग कर) प्रीत-मनाः (प्रीतियुक्त मन से) तत्-एव (वही) मे (मेरा) इदम् (यह) रूपम् (रूप) पुनः (फिर) प्र-पश्य (देखो)।
Hindi
मेरे इस विकराल रूप को देखकर तुम्हें न तो व्याकुलता, न ही मूढ़ भाव से ग्रस्त होना चाहिए! तुम निर्भय और प्रीतिपूर्ण मन से मेरे उसी {शंख-चक्र-गदा-पद्म-युक्त चतुर्भुज} रूप को पुनः देखो!
English
You should neither be pained nor bewildered by viewing My furious {Cosmic} Form; {now} without fear in mind and with joy in your heart watch My that {four-armed Vishnu} form once again. (11:49)
Hindi
True
English
'फिर से देखो' से यह स्पष्ट है कि अर्जुन ने पहले भी भगवान का चतुर्भुज रूप देखा था — श्लोक 11:17 में अर्जुन द्वारा श्रीकृष्ण के 'गदा, चक्र, किरीट' वाले रूप के दर्शन का ज़िक्र है; श्लोक 11:24 में तो अर्जुन उन्हें 'विष्णु' नाम से संबोधित भी कर चुका है। अर्थात, उसने भगवान के चतुर्भुज श्रीविष्णु रूप को यहाँ भी देखा — यह इस श्लोक से स्पष्ट है। श्लोक 11:46 में भी चतुर्भुज रूप के दर्शन का ही आग्रह उसके द्वारा किया गया था।