Vishwarupa Darshana Yoga
विश्वरूप दर्शन योग
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः। दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्॥ 11:20॥
द्यावा-पृथिव्योः, इदम् अन्तरम् हि, व्याप्तम् त्वया एकेन दिशः च सर्वाः; दृष्ट्वा अद्भुतम् रूपम् उग्रम् तव इदम्, लोक-त्रयम् प्र-व्यथितम् महा-आत्मन्।।
महा-आत्मन् (हे महान आत्मा)! इदम् (यह) द्यावा-पृथिव्योः (आकाश और पृथ्वी) अन्तरम् (और इसके बीच) च (और) सर्वाः (सभी); दिशः (दिशाएँ) एकेन (एक) त्वया (आपसे ) हि (ही) व्याप्तम् (व्याप्त हैं); तव (आपके) इदम् (इस) अद्भुतम् (अद्भुत) उग्रम् (उग्र) रूपम् (रूप को) दृष्ट्वा (देखकर) लोक-त्रयम् (तीनों लोक) प्र-व्यथितम् (अति व्यथित हो रहे हैं)।
Hindi
महात्मन! बाह्य आकाश और पृथ्वी के मध्य समस्त दिशाएँ अकेले आप से ही व्याप्त हैं; किन्तु आपके इस अपरिचित अदृष्टपूर्व उग्र रूप को देखकर तीनों लोक विचलित-से प्रतीत हो रहे हैं!
English
O, Exalted One! The enormous void between outer space and the earth is filled with your titanic figure embracing all directions. Your wondrous and furious appearance has left all three worlds flustered. (11:20)
Hindi
False