10:25श्रीभगवानुवाच

Vibhuti Yoga

विभूति योग

Sanskrit Shloka

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् । यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥ 10:25॥

Padacheeda (Word-by-Word)

महा-ॠषीणाम् भृगुः अहम्, गिराम् अस्मि एकम् अक्षरम्, यज्ञानाम् जप-यज्ञः अस्मि, स्थावराणाम् हिमालयः।

Anvaya (Construction)

अहम् (मैं) महा-ॠषीणाम् (महर्षियों में) भृगुः (भृगु), गिराम् (वाणी में) एकम् (एक) अक्षरम् (अक्षर) अस्मि (मैं हूँ), यज्ञानाम् (यज्ञों में) जप-यज्ञः (जप-यज्ञ), स्थावराणाम् (स्थावरों में) हिमालयः (हिमालय) अस्मि (मैं हूँ)।

Meaning

Hindi

मैं महर्षियों में भृगु, वाणी में प्रणव अर्थात ॐ हूँ, सब प्रकार के यज्ञों में जपयज्ञ और अचल रहने वालों में हिमालय हूँ।


English

Among the great sages, I am Bhrigu; among words, I am the monosyllabic sound "Aum"; among yajnas (spiritual practices), I am Japa-yajna (the chanting of God's names or Mantras); and among stationary objects, I am the mighty Himalayas. (10:25)

Commentary

Hindi

ईश्वर नाम जप की महिमा तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस में नाम-जप की महिमा अतुलनीय बतायी है और राम के नाम को स्वयं राम से भी श्रेष्ठ बता दिया। निश्चय ही यह कवि की आलंकारिक अभिव्यक्ति है, कितु अन्य धर्मग्रंथों में भी भगवान के नाम के जप की बड़ी महिमा बतायी गई है। भागवत पुराण के छठे स्कंध के दूसरे अध्याय में भगवान के नाम के माहात्म्य पर विस्तृत चर्चा है। प्रसंग अजामिल का है जो एक दुराचारी व्यक्ति था और जिसने मृत्यु के समय यमदूतों का दर्शन कर लिया और भय से अपने पुत्र नारायण को पुकारा। इसपर भगवान नारायण के दूत उसे बचाने आ गए और यमदूतों से उसकी रक्षा की और उसे नया जीवन दिया क्योंकि मृत्यु के ठीक पूर्व भगवान के नाम लेने का बड़ा महत्त्व है। भगवान ने गीता में स्वयं ही कहा है—अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्। यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥ 8:5॥ अर्थात, जो ईश्वर का स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है वह ईश्वरभाव को ही प्राप्त होता है, इसमें कोई संदेह नहीं। किंतु चूँकि अजामिल ने मृत्यु के समय "नारायण" को जरूर पुकारा किंतु स्मरण वह भगवान का नहीं बल्कि अपने पुत्र नारायण का कर रहा था, इसलिए विष्णुदूत उसे ईश्वर के धाम नहीं ले गए। फिर भी उन्होंने अजामिल को मृत्यु के पाश से तो छुड़ा ही लिया। नाम जप का प्रभाव और परिणाम अतः ईश्वर के नामजप का बड़ा महत्व है। भागवत पुराण कहता है : "जैसे कोई परम शक्तिशाली अमृत को उसका गुण ना जान कर अनजान में ही पी ले तो भी वह अवश्य ही पीने वाले को अमर बना देता है, (वैसा ही नाम जप का प्रभाव है)।"^2 अपने स्वामी के नाम की अकूत प्रशंसा करने वाले विष्णुदूतों की इसी बात को अधिक युक्तियुक्त तरीके से आगे स्पष्ट किया गया है कि भगवान के नाम जपने से मनुष्य की बुद्धि भगवान के गुण, लीला और स्वरूप में रम जाती है और स्वयं भगवान की उसके प्रति आत्मीय बुद्धि हो जाति है। ^3 जप अपने आप में सम्पूर्ण निदान नहीं नामों का जप, और उनका श्रवण कीर्तन करते, प्रभु की लीलाओं का गान करते-करते ईश्वर में प्रेम-भक्ति का उदय हो जाता है। अंततः भगवान के गुणों, लीलाओं और स्वरूप का बोध होने से भक्त की भाव-सशुद्धि और सत्त्व-संशुद्धि (चरित्र की शुद्धि) भी हो जाती है। बिना भाव-संशुद्धि और सत्त्व-सशुद्धि के, मात्र यांत्रिक रूप से नाम जपने से भी लाभ तो जरूर होता है किंतु बहुत अधिक लाभ नहीं होता। नाम जप, भक्ति, भजन-कीर्तन, भाव संशुद्धि और सत्त्व संशुद्धि से पूर्व के पाप भी नष्ट हो जाते हैं। अजामिल प्रसंग को नजदीक से देखें तो पता चलेगा की उसे वास्तव में मृत्यु के बाद नरक मिलना चाहिए था क्योंकि उसने सारे दुराचार किए थे। किंतु बाद में उपरुक्त कारणों से उसके सभी पाप नष्ट हो गए और उसे नरक नहीं जाना पड़ा बल्कि ईश्वर के परम धाम वैकुंठ चला गया और सदा के जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो गया। लेकिन देखिए, अजामिल ने क्या संकल्प लिए और क्या रास्ता अपनाया—"अज्ञानवश मैंने अपने को शरीर समझ कर इसके लिए बड़ी-बड़ी कामनाएं कीं और उनकी पूर्ति के लिए आने को पतित बनाया। उन्हीं का परिणाम है यह बंधन। अब मैं इसे काटकर समस्त प्राणियों का हित करूँगा, वासनाओं और शांत कर दूँगा, सब से मित्रतापूर्ण व्यवहार करूँगा, दुखियों पर दया करूँगाऔर पूरे संयम के साथ रहूँगा।"^4 अतः प्रेमपूर्वक नाम-जप और नाम-कीर्तन (संगीतमय तरीके से नाम-जाप) मोक्ष की ओर आरोहण की सीढ़ी है। जब कीर्तन पूर्वक झाल आदि बजाते हुए नाम जप किया जाता है तो भाव की तीव्रता आ जाती है और भाव की तीव्रता नाम के प्रभाव को कई गुना कर देती है। अतः कुछ देर नाम संकीर्तन भी करना उचित होता है। भागवत में शुकदेव जी कहते हैं "परीक्षित! बड़े-से-बड़े पापों का सर्वोत्तम, अंतिम और पाप वासनाओं को भी निर्मूल कर डालने वाला वाला प्रायश्चित्त यही है कि भगवान के गुणों, नामों और लीलाओं का कीर्तन किया जाए। इसी से संसार का कल्याण हो सकता है। जो लोग बार-बार भगवान के क्कृपापूर्ण और उदार चरित्रों का श्रवण-कीर्तन करते हैं, उनके हृदय में प्रेममयी भक्ति का उदय हो जाता है। उस भक्ति से जैसी आत्म-शुद्धि होती है, वैसी कृच्छ-चांद्रायण आदि व्रतों से भी नहीं होती।^5 नाम जप और मंत्र जप जप सिर्फ़ ईश्वर के नामों का ही नहीं होता है। जप ईश्वर के नाम से युक्त मंत्रों का भी होता है। भगवान नारायण और उनके अवतारों श्रीराम और श्रीकृष्ण के नाम को कोई भी, कभी भी, कहीं भी अपने मन से जप सकता है, किंतु शास्त्र कहते हैं कि मंत्रों को सामान्यतः किसी आचार्य या गुरु से ही प्राप्त करना बेहतर होता है। मंत्रों को कहीं भी, कभी भी नहीं जपा जा सकता और प्रत्येक देवता और प्रत्येक मंत्र के जप के अलग-अलग नियम हो सकते हैं जो आचार्य या दीक्षा-गुरु बताते हैं। नीचे वैष्णव मंत्र-दीक्षा के विषय में धर्मग्रंथों के के आधार पर कुछ तथ्य दिए जाते हैं। मंत्र-दाता आचार्य के लक्षण मंत्र देने वाले गुरु या आचार्य कौन हो सकते हैं, इसका उल्लेख कई धर्म-ग्रंथों में मिलता है। पद्मपुराण इस प्रकार लिखता है— "आचार्य ऐसे होने चाहिए जो ज्ञान से सम्पन्न, मेरे भक्त, द्वेष रहित, मंत्र के ज्ञाता, मंत्र के भक्त, मंत्र की शरण लेने वाले, पवित्र, ब्रह्मविद्या के विशेषज्ञ, मेरे भजन के सिवा और किसी साधन का सहारा न लेने वाले, अन्य किसी के नियंत्रण में न रहने वाले, ब्राह्मण,^6 वीतराग, क्रोध लोभ से शून्य, सदाचार की शिक्षा देने वाले, मुमुक्षु तथा परमार्थ वेत्ता हों। ऐसे गुणों से युक्त पुरुष को ही आचार्य कहा गया है। जो आचार की शिक्षा दे, उसी का नाम आचार्य है।" ^7 मंत्र प्राप्त करने वाले की पात्रता पुनः, मंत्र दीक्षा लेने वाले की अर्हता के विषय में कहा गया— "जो आचार्य के अधीन हो, उनके अनुशासन में मन लगाए और आज्ञापालन में स्थिरचित्त हो, उसे ही साधु पुरुषों ने शिष्य कहा है। ऐसे लक्षणों से युक्त सर्वगुणसंपन्न शिष्य को विधिपूर्वक उत्तम मंत्र का उपदेश करे। द्वादशी को श्रवण नक्षत्र में या वैष्णव के बताए हुए किसी भी समय में, उत्तम आचार्य की प्राप्ति होने पर दीक्षा ग्रहण करनी चाहिए।।" पद्मपुराण आगे कहता है : "लक्ष्मीनारायण मंत्र (ॐ नमो नारायण्य) सब फलों को देने वाला है। जो मेरा भक्त नहीं है, वह इस मंत्र को पाने का अधिकारी नहीं है। उसे बलपूर्वक दूर रखना चाहिए। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री, शूद्र तथा इतर जाति मनुष्य भी यादि मेरे भक्त हों तो वे सभी इस मंत्र को पाने के अधिकारी हैं जो मेरी शरण में आए हों, मेरे सिवा किसी दूसरे के का सेवन नहीं करते हों तथा अन्य किसी साधन का आश्रय नहीं लेते हों, ऐसे लोगों को इस उत्तम मंत्र का उपदेश देना चाहिए।"^8 भक्ति बिना जप के संभव है मगर जप बिना भक्ति के व्यर्थ है– बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा॥ (मानस, अयो. 177:3)। जप चाहे नाम का हो या मंत्र का। वह सबसे अधिक प्रभाव तब होता है जब उसमें तीन तत्त्वों का समन्वय हो : एक, जप; दो, जिसका जप किया जा रहा हो उसका ध्यान करना, ध्यान में उसकी छवि देखना ; तीन, उस ध्यान के साथ साथ आराध्य के प्रति भावना निर्मित करना। भावना की जितनी तीव्रता होगी उतना ही प्रभावी जप होगा। यदि मंत्र जप हो तो उसके लिए पवित्र स्थान पर बैठ कर शोर शराबे से मुक्त स्थान या समय में ध्यान करना श्रेष्ठ होता है क्योंकि ध्यान अधिक बेहतर लगता है। कई महात्मा कहते पाए जाते हैं को नाम का जप अपने आप में ही पूर्व औषधि है। इस की प्रमाण में वाल्मीकि का उदाहरण दिया जाता है की उन्होंने तो सिर्फ़ राम नान 'जप कर ही पूर्णता प्राप्त कर ली। किंतु यह नहीं भूलना चाहिए की जप करते हुए उनका ध्यान इतना प्रगाढ़ हो जाता था कि लंबे समय तक स्थिर रहने के करण उनके बैठने के स्थान पर दीमकों ने अपना डेरा बना लिया था, जिसके कारण उनका नाम ही 'वाल्मीकि' (दीमक के बिल से निकला हुआ) पड़ गया। अतः जप और ध्यान दोनों के संयुक्त प्रभाव से उन्हें सिद्धि मिली। आप यदि कुछ जप करने वालों से साक्षात्कार करेंगे तो उनमें से अनेक वयोवृद्ध पचास वर्षों तक माला जपने के बावजूद कुछ विशेष आध्यात्मिक उपपब्धि नहीं प्राप्त कर सके, यह वे स्वयं ही अकेले में बतायेंगे। इसका कारण यह है कि बिना भाव संशुद्धि, सत्त्व संशुद्धि, भक्ति भावना तथा परोपकार के नाम का प्रभाव पूरा फलित नहीं होता। इसीलिए "मुँह में राम बगल में छुरी" वाली कहावत प्रसिद्ध है। जप के प्रकार जप तीन प्रकार के होते हैं - वाचिक (बोल कर), उपांशु (बिना बोले, सिर्फ़ जीव हिले और शब्द दूसरे सुन नहीं पायें), और मानस (बिना जीभ हिलाए, बिना मंद या स्पष्ट ध्वनि उत्पन्न किए)। इनमें उपांशु और मानस जप को अधिक श्रेष्ठ माना जाता है। यदि नाम जप हो तो आदर्श यह है कि वह अहर्निश चलता रहे। उसमे मंत्र जप जैसे कोई बंधन नहीं होता। बात-चीत चलती रहे तो भी, जब बात बंद हो तो, मानस जप फिर शुरू हो जाता है। कुछ दिनों के अभ्यास के बाद जप स्वतः चलने लगता है, उसके बाद प्रयास नहीं करना पड़ता। साधक पाता है कि सोए में भी नाम-जप चलता रहता है। जब भी हल्की-सी नींद टूटती है तो साधक पाता है कि जप चल ही रहा है। 'लिखित' जप जप के साथ ध्यान भी बना रहे इसके लिए कुछ लोग कागज की कॉपी में भगवान का नाम लाल स्याही में लिखते हैं, खास कर गणित की कॉपी में जिसमें छोटे-छोटे चौकोर खाने बने रहते हैं।। ऐसा करने से ध्यान लगातार नामी (जिसका नाम लिखा जा रहा हो) में लगा रहता हैं, भटकता नहीं, और हर लिखावट के साथ मनसा जप भी चलता रहता है। ऐसा नाम जप सबसे प्रभावी देखा गया है। किंतु ऐसा नाम जप अहर्निश नहीं किया जा सकता। सेवा निवृत्त लोग विशेष रूप से कुछ देर, एक दो-घंटे ऐसा 'लिखित' जप भी कर सकते हैं।^9 श्रद्धालु एक लाख, दो लाख, पाँच लाख, दस लाख -जैसे राम नाम लिखने का संकल्प लेकर भी नाम लिखा करते हैं और संकल्प पूरा होने पर उन्हें 'रामनाम बैंक',^10 अयोध्या, प्रयाग, वाराणसी, आगरा पटियाल आदि में जमा कर दिया करते हैं। कुछ श्रद्धालु किसी मनोकामना की पूर्ति, या कठिन प्रारब्ध को मिटाने के लिए, यह संकल्प लेते हैं, कुछ निष्काम भाव से लिखते हैं। निष्काम भाव से यदि प्रतिदिन 108 बार भी नारायण, कृष्ण या राम का नाम लिख लिया जाए तो उत्तम हो। नाम-जप और मंत्र दीक्षा ईश्वर के नाम के जप और ईश्वर के नाम से बने मंत्रों के जप की विधि में अनत हो सकता है। अधिकांश शास्त्र मंत्रों के जप के लिए किसी योग्य गुरु से मंत्र दीक्षा लेने का निर्देश देते हैं। इस संबंध में श्लोक 17:14 के संदर्भ में आवश्यक विवरण दिए गए हैं। पाठक की सुविधा के लिए वे अंश यहाँ भी उद्धृत किए जाते है— • मंत्र सामान्यतः ऋषियों या संतों द्वारा निर्मित होते हैं। प्रायः सभी शास्त्र सहमत है कि यदि मंत्र दीक्षा लेनी हो तो किसी संत (गुरु) से ही लेनी चाहिए जो उस मंत्र का अभिप्राय और नियम जानता-समझता हो। ध्यान रहे कि हर देवता के हर मंत्र का एक जैसा नियम नहीं होता। जैसे किसी को पंचाक्षर मंत्र ॐ नमः शिवाय" का जप "ॐ नमः शिवाय" के तौर पर करना है या सिर्फ़ ""नमः शिवाय" के तौर पर, अथवा "शिवाय नमः" के रूप में, यह इस मंत्र का ज्ञाता गुरु ही बता सकता है। फिर, मंत्र जप के साथ कई प्रकार के नियम होते हैं, जिनका पालन करना आवश्यक होता है, अथवा विपरीत फल हो सकता है या मंत्र जप निष्फल हो सकता है। • किंतु ईश्वर के नाम-जप-मात्र से, बिना किसी मंत्र की दीक्षा लिए भी, काम चल सकता है। यदि अन्य शर्तों का पालन किया जाए, जो गीताजी में बताए गए हैं तो निष्काम भाव से नाम जपने से भी ईश्वर प्राप्ति हो सकती है। इसके लिए गुरुदीक्षा की अनिवार्यता नहीं होती। निष्काम नाम जप के कोई नियम नहीं होते।


English

Bhrigu was a revered sage or "rishi", counted among the seven great sages known as the "Saptarshis" and also among the "Prajāpatis," who facilitated creation. He is credited as the first compiler of predictive astrology and the author of the Bhrigu Samhitā, a renowned astrological text. Bhrigu is considered a "mānasaputra" or mind-born son of Brahmā. The adjectival form of his name, Bhārgava, refers to his descendants and followers. According to Manusmriti, Bhrigu lived during the time of Manu, a legendary progenitor of humanity, and both contributed significantly to the Manusmriti. There are many legends associated with Sage Bhrigu, who is said to have once been tasked by his fellow sages to test who among the Holy Trinity of Brahmā, Vishnu, and Shiva was the greatest. "Om" (or Aum), represented by ॐ in writing, is a symbol representing a sacred sound, syllable, mantra, and an invocation in Hinduism. Its written representation is the most important symbol of Hinduism. In Indic traditions, Om serves as a sonic representation of the Divine. The syllable is often found at the beginning and the end of chapters in the Vedas, the Upanishads, and other Hindu texts.In the Sacred Book, the Bhagavad-Gitā, the Lord has underlined the importance of "Aum" in verses 7:8; 8:13, 17; 10:25; 17:23. The practice of chanting God’s names, known as Japa-yajna, is an independent Yoga that is utilized by followers of various spiritual paths (Yogas) too. Saint Tulasidāsa says, “The great sage Vālmiki became God-like by chanting God’s names even in an inverse manner” (193:4, Ayodhyā Kānda, Rām-charit-mānas). Chanting God's names is often seen as an integral component of Bhakti Yoga or the Path of Loving Devotion. In the Rām-charit-mānas, it seems evident from Bhagawān Rāma’s teachings that Chanting Yoga (Japa Yoga) and the Path of Loving Devotion (Bhakti Yoga) can be considered distinct spiritual paths, as expressed by the statement, “Tell me, what efforts are needed in loving devotion to God? It neither requires yajna (Vedic sacrificial fire-ceremonies), chanting of God’s names, austerities, nor fasting.” (45:1, Uttara Kānda, Rām-charit-mānas). However, the two paths may complement each other, even though Saint Tulasidāsa conveys that the Path of Loving Devotion (Bhakti Yoga) can be pursued without necessarily chanting God’s names, but the fruits of Chanting Yoga (Japa Yoga) may not be realized without loving devotion (Bhakti) to God (177:3, Ayodhyā Kānda, Rām-charit-mānas). Even so, Tulasidāsa repeatedly emphasizes the significance of chanting God’s names for everybody in many of his utterances.

Footnotes

^2 भागवत महापुराण, स्कंध 6, अध्याय 2, श्लोक 19 । ^3 भागवत पुराण, स्कंध 6, अध्याय 2, श्लोक 9-10 । ^4 भा. पु., स्कंध 6, अ. 2, श्लोक 35-36 । ^5 भागवत पुराण, स्कंध ६, अध्याय ४, श्लोक ३१, ३२ ^6 'ब्राह्मण' को गीता ने जन्म के आधार पर परिभाषित नहीं किया बल्कि गुण, कर्म और स्वभाव के आधार पर निर्धारित किया है। ब्राह्मण की परिभाषा के लिए गीता का श्लोक 18:42 देखें। ^7 संक्षिप्त पद्मपुराण (गीत्रा प्रेस), उत्तरखंड, पृष्ठ 835 । ^8 संक्षिप्त पद्म पुराण (गीता प्रेस) पृष्ठ ९३४, उत्तर खंड : "सनातन मोक्ष मार्ग और मंत्र दीक्षा का वर्णन", एवं "भगवान विष्णु की महिमा, उनके भक्ति के भेद तथा अष्टाक्षर मंत्र के स्वरूप एवं अर्थ का निरूपण" नामक अध्या देखें, जिसमें अष्टाक्षर मंत्र "ॐ नमो नारायणाय" का स्वरूप और महिमा दी गई है। पद्मपुराण की विवृत्ति के अनुसार "ॐ नमो नारायणाय" मंत्र में ॐ (अ ऊ म) में 'अ' से विष्णु और 'ऊ' से लक्ष्मी देवी द्योतित होती हैं। ^9 पटना में लेखक के परिचित एक सेवानिवृत अधिकारी सरयू प्रसाद सिंह भगवती दुर्गा के बड़े भक्त थे। वे बड़ी साधु पुरुष थे। वे साथ-साथ राम नाम का घंटों लिखित जप किया करते थे। उन्हें अत्यंत वृद्धावस्था में पार्किंसंस नाम की एक बीमारी हो गई थी जिसमें हाथ हिलते रहते हैं। इससे राम नाम लिखने में असुविधा होने लगी। फिर भी वे घंटों राम राम लिखने से बाज नहीं आते थे। जब बीमारी ज्यादा बढ़ने लगी और अक्षर बिखरने लगे लगे तो एक दिन उन्होंने कलम उठा कर फेंक दी यह कहते हुए कि "जाओ जब तुम्हीं नहीं चाहते कि मैं तुम्हारा नाम लिखूँ, तो ठीक है, यही सही।" इस घटना के तुरंत बाद उनकी बीमारी काफूर हो गई और वे एक बार फिर से घंटों राम राम लिखने में लग गए। सारी दवाइयाँ भी छूट गईं। ^10 यह अलग अलग स्थानों पर अलग अलग नामों से जाना जाता है, जैसे बाराणसी यह अलग अलग स्थानों पर अलग अलग नामों से जाना जाता है, जैसे बाराणसी में 'रामरमापति बैंक' (D‑5/35, त्रिपुरा भैरवी रोड; फ़ोन: 0542-2392488) है, प्रयाग (U‑5 NPA Arcade, 23 Mahatma Gandhi Marg; फ़ोन: 093052 35153) में रामनाम बैंक के नाम से है, अयोध्या में श्रीसीता रामनाम बैंक (मणिराम की छावनी, राम शहर; मुख्य शाखा, शाखा-संख्या ~136) के नाम से।