9:19श्रीभगवानुवाच

Raja Vidya Raja Guhya Yoga

राजविद्या राजगुह्य योग

Sanskrit Shloka

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च। अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥ 9:19॥

Padacheeda (Word-by-Word)

तपामि अहम्, अहम् वर्षम् नि-गृह्णामि, उत्-सृजामि च; अमृतम् च एव, मृत्युः च, सत्-असत् च अहम्, अर्जुन!

Anvaya (Construction)

अहम् (मैं) तपामि (तपता हूँ) वर्षम् (वर्षा) नि-गृह्णामि (निग्रह करता हूँ) च (और) उत्-सृजामि (उत्पन्न करता हूँ), अर्जुन (हे अर्जुन)! अहम् (मैं) एव (ही) अमृतम् (अमृत) च (और) मृत्युः (मृत्यु) च (और) सत्-असत् (सत और असत) च (भी) अहम् (मैं ही हूँ)।

Meaning

Hindi

मैं ही सूर्य रूप से तपता हूँ, वर्षा को बादलों में रोक कर रखता हूँ और फिर उसे बरसाता हूँ। हे अर्जुन! मैं ही अमृतत्व और मृत्यु हूँ और सत्-असत् भी मैं ही हूँ।


English

I warm the water bodies, gather and hold the rains within clouds, and then release them upon the earth. I am both death and immortality; I am existence and the cessation of existence, O Arjuna. (9:19)

Commentary

Hindi

इन शब्दों के दो तरह के अर्थ होते हैं — "अच्छा–बुरा" (जैसे सत्कर्म, सद्भावना आदि में) और "अविनाशी (ब्रह्म)–नाशवान (जगत)"। कौन सा अर्थ यहाँ होगा, यह चिंतन करने योग्य है। इस चिंतन से "Problem of Evil", जो पश्चिम में — विशेषतः ईसाई धर्म, इस्लाम, यहूदी धर्म आदि में — एक बड़ा विवाद का मुद्दा रहता है, उस पर प्रकाश पड़ता है। अब्राहमिक धर्मों में बुरे के लिए शैतान को ज़िम्मेदार माना जाता है, जो पूरी तरह ईश्वर के नियंत्रण में नहीं रहता; और अच्छाई के लिए ईश्वर को ज़िम्मेदार माना जाता है। सनातन धर्म में ईश्वर के नियंत्रण के बाहर कोई सत्ता नहीं होती — कोई शैतान नहीं होता। सत–असत, सभी कुछ ईश्वर में ही समाहित है।