Akshara Brahma Yoga
अक्षर ब्रह्म योग
कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः। सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥ 8:9॥
शब्द-विभाजन : कविम् पुराणम्, अनु-शासितारम्, अणोः अणीयांसम्, अनु-स्मरेत् यः; सर्वस्य धातारम्, अ-चिन्त्य-रूपम्, आदित्य-वर्णम्, तमसः पर:-तात्—
यः (जो) कविम् (विचारशील व्यक्ति) पुराणम् (प्राचीनतम्) अनु-शासितारम् (शासन करने वाला) अणोः अणीयांसम् (सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतम) सर्वस्य (सभी का) धातारम् (धारक) अ-चिन्त्य-रूपम् (चिंतन -शक्ति से परे रूप वाला) आदित्य-वर्णम् (सूर्य के वर्ण वाला) तमसः (अंधकार से) पर:-तात् (अत्यंत उच्चतम् का) अनु-स्मरेत् (स्मरण करे)।
Hindi
जो सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियन्ता, सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म, सबके धारण-पोषण करने वाले, चिंतन-शक्ति से परे, सूर्य के समान चेतन प्रकाश-रूप और अंधकार-अविद्या से अति परे परमेश्वर का स्मरण करता करता है,
English
He, who meditates on the One that is Omniscient, Primordial, Ruler of the Universe, Sustainer, and Provider of all, Subtler than the subtlest whose Form is beyond comprehension, and who is Effulgent like the sun, absolutely beyond murk and gloom; (8:9)