8:16श्रीभगवानुवाच

Akshara Brahma Yoga

अक्षर ब्रह्म योग

Sanskrit Shloka

आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन। मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥ 8:16॥

Padacheeda (Word-by-Word)

आ-ब्रह्म-भुवनात् लोकाः, पुनः-आ-वर्तिनः, अर्जुन! माम् उपेत्य तु कौन्तेय, पुनः जन्म न विद्यते।

Anvaya (Construction)

अर्जुन (हे अर्जुन)! आ-ब्रह्म-भुवनात् लोकाः (ब्रह्मा के लोक तक) पुनः-आ-वर्तिनः (फिर से लौटने वाले हैं) तु (परंतु) कौन्तेय (हे कौन्तेय)! माम् (मुझे) उपेत्य (प्राप्त कर) पुनः (फिर से) जन्म (जन्म) न (नहीं) विद्यते (होता)।

Meaning

Hindi

हे अर्जुन! ब्रह्म-लोक तक {स्वर्ग आदि} सभी लोक पुनरावर्ती हैं, यानी पुण्य चुक जाने पर वहाँ से लौटकर फिर मृत्यु-लोक में आना पड़ता है। परंतु हे कुन्तीपुत्र! मुझको प्राप्त होकर फिर पुनर्जन्म नहीं होता।


English

Men fall into rebirth from the supernal planet of Brahmā and all other ethereal worlds downwards. But, on reaching Me, O, son of Kunti, there is no return to reincarnations. (8:16)

Commentary

Hindi

बृहदारण्यक उपनिषद के अनुसार भी यज्ञ, देवताओं की आराधना और वेद-अध्ययन आदि कर्मों से यद्यपि इंद्रलोक, वरुण लोक, सूर्यलोक और शायद ब्रह्म-लोक (ब्रह्मा का लोक) भी प्राप्त हो जाए, फिर भी पुण्य चुक जाने पर वहाँ से लौटकर फिर इस लोक में जन्म लेना ही पड़ता है (बृहदारण्यक, 4:4:6)। विभिन लोकों के विषय में भागवत पुराण की यह टिप्पणी द्रष्टव्य है : "ब्रह्मा ने पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग लोक की रचना की. देवताओं की निवास के लिए स्वर्लोक, भूत-प्रेतादि के लिए भुवर्लोक (अंतरिक्ष) और मनुष्यों के लिए भुर्लोक (पृथ्वीलोक) का निश्चय किया गया। असुर और नागों के लिए पृथ्वी के नीचे अतल, वितल, सुतल आदि सात पाताल बनाये। योग, तपस्या और संन्यास के द्वारा, महर्लोक, जनलोक, तपलोक रूप उत्तम गति प्राप्त होती है, तथा भक्तियोग से मेरा धाम मिलता है।"


English

The realm of the Semi-God Brahmā exists on a higher plane than heaven (Indraloka).

Footnotes

^1 भागवत पुराण, स्कंध 11, अध्याय 24, श्लोक 11-14