Jnana Vijnana Yoga
ज्ञान विज्ञान योग
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्। धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥ 7:11॥
बलम् बलवताम् च अहम्, काम-राग-वि-वर्जितम्; धर्म-अ-विरुद्धः भूतेषु कामः अस्मि, भरत-ॠषभ!
भरत-ॠषभ (हे भरतकुलश्रेष्ठ)! अहम् (मैं) बलवताम् (बलवानों का काम-राग-वि-वर्जितम् (काम और आसक्ति से मुक्त) बलम् (बल हूँ) च (और) भूतेषु (सभी प्राणियों में) धर्म-अ-विरुद्धः (धर्म के अनुकूल) कामः (काम) अस्मि (हूँ)।
Hindi
हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! मैं बलवानों का आसक्ति और कामनाओं से रहित बल या सामर्थ्य हूँ, और सब प्राणियों में ऐसा काम (रति-भाव) हूँ, जो धर्म के विरुद्ध नहीं हो।
English
I am the longing-and-attachment-free might of the mighty, and I am that sexuality, which is not contrary to dharma (righteousness), O, Mightiest of the Descendants of King Bharata! (7:11)
Hindi
काम-तत्त्व न केवल मनुष्यों और अन्य जीवों में विद्यमान है, बल्कि देवताओं और महादेवताओं में भी उपस्थित रहता है। भागवतपुराण में महादेवता ब्रह्मा के विषय में यह कथा मिलती है कि उन्हें अपने द्वारा संकल्प-मात्र से उत्पन्न की गई सरस्वती देवी पर कामासक्ति हो गई, जो उनकी विवाहिता पत्नी नहीं थीं। यद्यपि यह एक मानसिक विकार-मात्र था, इसकी ऋषियों द्वारा तत्काल निंदा हुई और ब्रह्माजी को अपना वह शरीर छोड़कर दूसरा शरीर ग्रहण करना पड़ा। यद्यपि सरस्वती को, मैथुनी सृष्टि से उत्पन्न नहीं होने के कारण, ब्रह्मा की पुत्री कहना उचित नहीं; वे ब्रह्माजी की सृष्टि अवश्य थीं। यह कथा यह प्रदर्शित करने के लिए है कि अधर्मपूर्ण काम-भाव मानसिक स्तर पर भी उचित नहीं, चाहे वह व्यवहार में रतिकर्म में परिणत न भी हो। इसी भागवतपुराण में भगवान शिव और देवी अंबिका के रति-विलास की कथा भी नवम स्कंध के प्रथम अध्याय में मिलती है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि महादेवता भगवान शिव भी गृहस्थ होने के नाते, काम पर विजय पाने और कामी न होने के बावजूद, रति-विलास के आनंद की उपेक्षा नहीं करते। ऋषिगण सुमेरु पर्वत की तलहटी वाले वन में जब उनके दर्शन करने जाते हैं तो उन्हें भवानी के साथ रति-क्रीड़ा में व्यस्त देखकर चुपचाप वापस चले जाते हैं—सवाल नहीं उठाते, निंदा नहीं करते—क्योंकि यह 'धर्म के अविरुद्ध' रति-कर्म था, अपनी विवाहिता पत्नी के साथ एक गृहस्थ का स्वाभाविक कर्म था। काम पर पूर्ण विजय प्राप्त करने वाले भगवान शिव के कैलास पर्वत पर ही 'प्रियतमों के साथ विहार करती हुई सिद्धपत्नियों का क्रीड़ा-स्थल' भी है। अर्थात, कैलास में ही सिद्धगण की पत्नियाँ सिद्धगणों के साथ क्रीड़ा किया करती हैं। कैलास के ही अंग अलका नगरी में 'रति-विलास से थकी हुई देवांगनाएँ अपने-अपने निवास-स्थान से आकर नदियों में जलक्रीड़ा करती हुई' पाई जा सकती हैं (अध्याय 6, चतुर्थ स्कंध, भागवत महापुराण में कैलास का वर्णन)। जब महादेव-जैसे योगी-गृहस्थ, सिद्धगण और उनकी पत्नियाँ तथा देवांगनाएँ भी रति-विलास का आनंद लेते हैं तो भला मनुष्यों के लिए वह क्यों निषिद्ध हो? इस प्रश्न का उत्तर भागवत के शिव-अंबिका प्रसंग और भगवद् गीता के इस श्लोक से मिलता है। काम या रति-कर्म तो आनंद का एक प्रकृति-प्रदत्त स्रोत है, यद्यपि उसका अतिरेक वैसे ही हानिकारक हो सकता है, जैसे पेट से अधिक भोजन करना हानिकारक हो सकता है। (काम या रति-कर्म पर अधिक जानने के लिए, इसी पुस्तक के प्रारंभ में दिए गए विचार-कोश में 'काम' पर प्रविष्टि को भी देखा जा...)