Jnana Vijnana Yoga
ज्ञान विज्ञान योग
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः। असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥ 7:1॥
मयि आसक्त-मनाः, पार्थ, योगम् युञ्जन् मत्-आश्रयः! अ-संशयम् समग्रम् माम् यथा ज्ञास्यसि, तत् श्रृणु।
पार्थ (हे पृथापुत्र)! मयि (मुझमें) आसक्त-मनाः (आसक्त मन वाला ) मत्-आश्रयः (मेरे आश्रय में स्थित) योगम् (योग के) युञ्जन् (अभ्यास में लगा हुआ) यथा (कैसे) समग्रम् (समग्रता में) माम् (मुझे) अ-संशयम् (संशय-रहित होकर) ज्ञास्यसि (जानेगा) तत् (वह) श्रृणु (सुनो)।
Hindi
हे अर्जुन! मुझमें आसक्त चित्त से मेरे शरणागत होकर, योग-रत होकर तुम जिस प्रकार मुझको मेरी समग्रता में निःसंदेह जानोगे, उसको सुनो।
English
Ever remain in My shelter with your heart glued to Me and mind firmly on the path of God-realization, O, Son of Prithā! Listen to how you may know Me in My totality {not merely My pure Self but all My manifestations in the phenomenal world}. (7:1)
Hindi
न केवल मेरे शुद्ध स्वरूप का ज्ञान, बल्कि मैं संसार में कैसे अभिव्यक्त होता हूँ — इसका भी ज्ञान; आध्यात्मिक और जागतिक, दोनों प्रकार का समग्र ज्ञान तुम्हें प्राप्त हो पाएगा — यही तात्पर्य है।