Karma Sannyasa Yoga
कर्म संन्यास योग
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः। स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥ 5:24॥
यः अन्तः-सुखः, अन्तः-आरामः तथा अन्तः-ज्योतिः एव यः —सः योगी ब्रह्म-निर्वाणम् ब्रह्म-भूतः अधि-गच्छति।
यः (जो) एव (इस प्रकार) अन्तः-सुखः (आंतरिक सुख) अन्तः-आरामः (आंतरिक शांति) तथा (और) यः (जो) अन्तः-ज्योतिः (आंतरिक ज्योति से प्रकाशित है) सः (वह) ब्रह्म-भूतः (ब्रह्म-रूप हुआ) योगी (योगी) ब्रह्म-निर्वाणम् (ब्रह्म-निर्वाण को) अधि-गच्छति (प्राप्त करता है)।
Hindi
जो अंतःकरण में सुख धारण करने वाला है, आत्मा में ही रमण करने वाला है, तथा जिसकी अंतरात्मा में प्रकाश फूट रहा है, वह ब्रह्म-स्वरूप हुआ योगी ब्रह्म-निर्वाण को प्राप्त करता है।
English
One who finds happiness within, joys within, and whose inner self is lit up {by the light of God-realization}—that spiritual seeker (Yogi) becomes one with God and attains liberation from the cycle of birth and death, permanently stepping into the Being of God-the-Supreme, never to come back. (5:24)
Hindi
जीव की सर्वोच्च गति को इंगित के लिए भगवान ने गीता में कई शब्दों का प्रयोग किया है जिनमें एक है 'ब्रह्मनिर्वाण' जो इस श्लोक में भी प्रयुक्त हुआ है। इस श्लोक के अलावा यह 2:72, 5:25, और 5:26 में भी आया है। कई श्लोकों में इस सर्वोच्च गति को 'परम निर्वाण' (6:15), परम गति (6:45), मोक्ष (7:29), परम धाम (11:38), शाश्वत स्थान (18:62) आदि नाम भी दिये गये हैं। श्लोक संख्या 18:18 और 18:20 से यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर का परम धाम 'अव्यक्त' है। अतः ब्रह्मनिर्वाण अथवा परम निर्वाण एक 'अव्यक्त' गति है। समस्या यह है कि भक्तिमार्गी भक्त तो वैकुंठ जाना चाहते हैं, जहाँ से भी फिर लौट कर नहीं आना पड़ता, ऐसी मान्यता है। लेकिन वैकुंठ तो 'अव्यक्त' नहीं, 'व्यक्त' लोक है, उसकी एक रूप-रेखा है। तो उसे 'मोक्ष' या 'परमनिर्वाण' माना जाए या नहीं, यह एक बड़ा प्रश्न है। भगवान विष्णु के द्वारा अपने ही स्वरूप श्रीकृष्ण के मुख से भगवद्-गीता का वाचन किया गया, यह तो गीता के ग्यारहवें अध्याय में भगवान विष्णु के विश्वरूप से स्पष्ट है, और वैशम्पायन के उस प्रसिद्ध वाक्य से भी, जो गीता के समाप्त होते ही महाभारत में कहा गया।^2 तो फिर सर्वोच्च गति 'व्यक्त' वैकुंठ है या ईश्वर का 'अव्यक्त' धाम? इस बात को महाभारत के अनुगीतापर्व के सोलहवें अध्याय के श्लोक 15 से 41 में पाए जाने वाले इस आख्यान से समझा जा सकता है, जिसे श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सुनाया था। इस कहानी के अनुसार एक श्रेष्ठ ब्राह्मण काश्यप की एक अनाम, सिद्ध महात्मा से मुलाकात हुई जिनसे तत्त्वज्ञान पर उनकी चर्चा हुई। उन सिद्ध और जीवन्मुक्त महात्मा ने अनुगीतापर्व के सोलहवें अध्याय के श्लोक 39 से 42 में अव्यक्त गति ब्रह्मनिर्वाण पर यह ज्ञान दिया— "..मैंने दुखों से घबरा कर निराकार परमात्मा की शरण ली..। इस लोक में अनुभव के पश्चात मैंने इस मार्ग का अवलंबन किया है और अब परमात्मा की कृपा से मुझे यह उत्तम सिद्धि प्राप्त हुई है। अब मैं पुनः इस संसार में नहीं आऊँगा। जब तक यह सृष्टि कायम रहेगी और जब तक मेरी अंतिम मुक्ति नहीं हो जाएगी, तब तक मैं अपनी और अन्य प्राणियों की शुभ गति का अवलोकन करूँगा। फिलहाल मैं उत्तम लोक में जाऊँगा। फिर उससे भी उत्कृष्ट सत्यलोक में पहुँचूँगा और क्रमशः अव्यक्त पद को प्राप्त कर लूँगा। .. अब मैं पुनः मर्त्यलोक में नहीं आऊँगा।" अनुगीता के उपर्युक्त अंश का आशय यह है कि जब तक सृष्टि है तब तक वैकुंठगामी भक्त बिना मृत्यु-लोक में लौटे वैकुंठ का सुख उठायें, ईश्वर की व्यक्त लीलाओं का आनंद लें, और जब महाप्रलय के समय सृष्टि का निराकार में विलय हो तो वैकुंठ से ही ईश्वर के 'अव्यक्त' धाम पहुँच जायें, जिसे गीता में 'ब्रह्मनिर्वाण' कहा है। वैकुंठ से तो कभी-कभी अपवाद-स्वरूप परिस्थितियों में वैकुंठ के द्वारपालों जय-विजय की तरह मर्त्यलोक में कुछ दिनों के लिए आना भी पड़ सकता है, लेकिन ब्रह्मनिर्वाण के बाद सदा-सदा के लिए आवागमन से, पुनर्जन्म के चक्र से, अंतिम मुक्ति मिल जाती है। शुद्ध निराकारवादी ज्ञानियों तथा शुद्ध भक्तों, दोनों को ही अंततः ब्रह्मनिर्वाण मिलता है, किंतु निराकार ब्रह्म के उपासकों को श्रीकृष्ण या भगवान नारायण की लीलाओं का आनंद नहीं मिल सकता, भले ही वे निराकारवादी अपने मन के किसी उच्च लोक में, जैसे ब्रह्मलोक में, जा कर विश्राम कर सकते हैं, जैसा कि उन परमसिद्ध ब्राह्मण महात्मा ने किया। इस विवेचन के बाद भी एक प्रश्न बच ही जाता है : जब महाप्रलय के समय सृष्टि का निराकार परमेश्वर में विलय होगा तब सभी पापी भी तो निराकार ब्रह्म में लीन हो जाएँगे; तो क्या यह कह सकते हैं कि उन्हें 'ब्रह्मनिर्वाण' प्राप्त हो गया? क्या सृष्टि के अंत में ब्रह्म में लीन हो जाना ही 'ब्रह्मनिर्वाण' कहा जा सकता है? अगर ऐसा है, तो फिर इतनी आध्यात्मिक साधना करने से लाभ क्या हुआ, यदि सभी की अंतिम गति एक ही होनी है? इस प्रश्न के उत्तर के कई पहलू हैं। सृष्टि के निराकार में विलोप हो जाने के बाद भी पुनः नई सृष्टि होगी। सृष्टि और विलय का चक्र तो चलता ही रहता है। इस सृष्टि-चक्र के महाप्रलय के समय मुक्त आत्माओं को कोई व्याकुलता नहीं होगी; बाकी को मर्मांतक पीड़ा होगी। फिर जब नई सृष्टि होगी तो उन मुक्त आत्माओं का पुनः मर्त्यलोक में आगमन नहीं होगा जिन्होंने ब्रह्मनिर्वाण प्राप्त कर लिया था। बाकी आत्माएँ पुनः पैदा होंगी, और फिर से जन्म-मरण, सुख-दुख के चक्र में पड़ेंगी। भगवान आगे चल कर चौदहवें अध्याय में इसीलिए कहते हैं— इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः। सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥14:2॥ अर्थात, ज्ञान की शरण में आकर मेरे साधर्म्य को प्राप्त हुए लोग सृष्टि के आदि में {फिर से} पैदा नहीं होते और प्रलय-काल में भी व्याकुल नहीं होते। एक और बात ध्यान रखने-योग्य है। जीवित रहते हुए मुक्ति प्राप्त कर लेने के बाद मुक्त आत्माओं का जीवन महाप्रलय तक दुःखमुक्त और आनन्दमय रहेगा, क्योंकि महाप्रलय तक उनका निवास उत्तम लोकों में होगा, और महाप्रलय होने तक भी मृत्युमय संसार में लौटना नहीं पड़ेगा।
^2 गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रसंग्रहैः। या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता।। (महाभारत, भीष्मपर्व, अध्याय 43, श्लोक 1) "गीता के रहते अन्य शास्त्रों के संग्रह की क्या आवश्यकता? यह तो स्वयं पद्मनाभ भगवान विष्णु के मुखारविंद से निकली वाणी है।"