5:2श्रीभगवानुवाच

Karma Sannyasa Yoga

कर्म संन्यास योग

Sanskrit Shloka

सन्न्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ। तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥ 5:2॥

Padacheeda (Word-by-Word)

सन्यासः कर्म-योगः च, निःश्रेयस-करौ उभौ, तयोः तु कर्म-सन्न्यासात् कर्म-योगः वि-शिष्यते।

Anvaya (Construction)

सन्यासः (काम्य कर्मों का त्याग) च (और) कर्म-योगः (कर्म-योग) उभौ (दोनों) निःश्रेयस-करौ (उच्चतम कल्याण प्रदान करने वाले हैं) तु (किन्तु) तयोः (उन दोनों में से) कर्म-सन्न्यासात् (कर्म के त्याग से) कर्म-योगः (कर्म-योग) वि-शिष्यते (विशिष्ट होता है)।

Meaning

Hindi

{ईश्वर-प्राप्ति के लिए} कर्मों को छोड़ना अर्थात संन्यास, और {ईश्वर-प्राप्ति के लिए} कर्मों में लगना अर्थात कर्म-योग, ये दोनों ही परम कल्याणकारी हैं, परंतु इन दोनों में भी {ईश्वर-प्राप्ति या मुक्ति के लिए} कर्म छोड़ने की अपेक्षा कर्मों में लगना विशिष्ट है।


English

Renunciation of actions and detached actions, both spiritual paths, can potentially lead to the ultimate goal—Nirvāna. However, between the two, the latter path holds a unique distinction. (5:2)

Commentary

Hindi

संन्यास का क्या अर्थ होता है, यह महर्षि भृगु के मुख से महाभारत में यों बताया गया है—"अब संन्यासियों का आचरण बतलाया जाता है, जो इस प्रकार है : संन्यास आश्रम में प्रवेश करने वाले पुरुष अग्निहोत्र, धन, स्त्री आदि परिवार तथा घर की सारी सामग्री का परित्याग करके भोगों और संगों के प्रति अपनी आसक्ति के बंधनों को तोड़कर सदा के लिए घर से बाहर निकल जाते हैं। मिट्टी, पत्थर और सुवर्ण को समान समझते हैं। धर्म, अर्थ और काम संबंधी प्रवृत्तियों से उनकी बुद्धि आसक्त नहीं होती। शत्रु, मित्र और उदासीन—सबके प्रति वे समान दृष्टि रखते हैं। स्थावर, पिंडज, अंडज, स्वेदज और उद्भिज प्राणियों के प्रति मन, वाणी और क्रिया द्वारा कभी द्रोह नहीं करते। वे कुटी या मठ बनाकर नहीं रहते। उन्हें चाहिए कि चारों ओर विचरते रहें तथा रात्रि में ठहरने के लिए पर्वत की गुफा, नदी का किनारा, वृक्ष की जड़, देवमंदिर, नगर अथवा गांव में चले जाया करें। नगर में पांच रात्रि और गांव में एक रात से अधिक न ठहरें। प्राणधारण के लिए ऐसे घरों पर जाकर खड़े हो जाएँ जहाँ संकीर्णता न हो। बिना मांगे ही पात्र में जितनी भिक्षा आ जाए, उतनी ही स्वीकार करें। काम, क्रोध, दर्प, लोभ, मोह, कृपणता, दंभ, निंदा, अभिमान तथा हिंसा से सर्वथा दूर रहें।"^1 बनारसवासी ध्यान-योगी लाहिड़ी महाशय (1828-1895) सदा गृहस्थ जीवन में रहे, संन्यास नहीं लिया, कई संतानें उत्पन्न कीं, फिर भी सतत ध्यान-साधना से योग के शिखर पर पहुँचे और पूरे भारत के संत-समाज में प्रसिद्ध व समादृत हुए। उन्होंने गृहस्थ आश्रम को उत्तम बताया। निश्चय ही वे अपवादस्वरूप रहे, मगर उनकी जीवनी पढ़ने योग्य है। गीताप्रेस के संस्थापक महात्मा जयदयाल गोयंदका 'सेठजी' और उनके सहयोगी हनुमान प्रसाद पोद्दार 'भाईजी' ने गृहस्थ जीवन में रहकर भगवान की अप्रतिम सेवा की और दोनों को भगवान नारायण के चतुर्भुज रूप के दर्शन भी हुए, जो अत्यंत विरल है। गृहस्थ जीवन में रहकर परमगति पाने के असंख्य उदाहरण हैं। संन्यास उसी को ग्रहण करना चाहिए जिसमें संन्यास की स्वाभाविक प्रवृत्ति हो; अन्यथा संन्यास टिकता नहीं, और कभी-कभी तो अनाचार का कारण भी बन जाता है—विशेषकर तब, जब संन्यास युवावस्था में ले लिया जाता है।


English

Indeed, the spiritual journey can take various paths, and renunciation of worldly life is not the sole route to attaining spiritual enlightenment. Shyama Charan Lahiri Mahashaya, for instance, lived a married life, had a family, and produced children, yet he reached the highest levels of Yoga through unwavering meditation practice. His dedication and attainment were recognized and respected by accomplished saints in India. Similarly, Sri Jaydayal Goyandka and Sri Hanuman Prasad Poddar chose to lead family lives without renouncing the world, but they rendered exceptional service to God by making the Bhagavad-Gitā and many other scriptures accessible to people across India at affordable prices. Remarkably, both of them had the rare privilege of encountering and meeting God Personified, Lord Nārāyana, in person. Their experiences underscore that profound spiritual achievements are attainable without necessarily renouncing worldly life. These examples remind us that the spiritual path is diverse and can accommodate various lifestyles and choices. What truly matters is one’s devotion, dedication, and commitment to spiritual growth and service to humanity.

Footnotes

^1 3, द्विनवत्यधिकशततमोऽध्याय, मोक्षधर्मपर्व (शान्तिपर्व), महाभारत।