Karma Yoga
कर्म योग
मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा। निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥ 3:30॥
मयि सर्वाणि कर्माणि सन्नयस्य अध्यात्म-चेतसा, निर्-आशीः निर्-ममः भूत्वा युध्यस्व विगत-ज्वरः।।
अध्यात्म-चेतसा (आध्यात्मिक चेतना से) सर्वाणि (सभी) कर्माणि (कर्मों को) मयि (मुझमें) सन्नयस्य (समर्पित करके) निर्-आशीः (आशा रहित होकर) निर्-ममः (ममत्व रहित होकर) विगत-ज्वरः (संताप-रहित) भूत्वा (होकर) युध्यस्व (युद्ध कर)।
Hindi
इसलिए, हे अर्जुन, आत्म-ज्ञान से पूर्ण होकर सारे कर्मों को मुझमें अर्पण करके आशा-रहित, 'मेरा'-पन से रहित, और {मन के} बुखार या ताप से मुक्त होकर युद्ध करो!
English
Remaining stable in divine consciousness and consecrating all actions to Me, fight the battle unshackled by ego and expectations, free from the fever {of anxieties}. (3:30)
Hindi
ईश्वर को समर्पित करके सारे कर्म करना, यह कर्म-योग का मुख्य सूत्र है। मगर कुछ लोग इसका ग़लत अर्थ भी लगाते हैं। वे अपने दुष्कर्मों को भी ईश्वर को समर्पित करके करते हैं और अपने-आप को पाप-मुक्त हुआ मान लेते हैं। कई डाकू डाका डालने के पहले देव-मंदिर में जाकर अपना कर्म (दुष्कर्म) देव या देवी को समर्पित करते हैं, उसके बाद डाका डालने जाते हैं। आप अखबारों में एक विचित्र खबर अक्सर पढ़ते रहे होंगे : सीरिया-इराक में इसलामिक स्टेट के जिहादी सैनिक युद्ध के दौरान अपने द्वारा कब्जे में ली गई औरतों से जबरदस्ती उनकी मर्जी के विरुद्ध शारीरिक संबंध बनाते थे (बलात्कार करते थे), वह भी कभी-कभी उनके पतियों के सामने। उनके अनुसार युद्ध में जीती गई औरतों और अन्य गुलाम स्त्रियों के साथ बिना उनकी मर्जी के शारीरिक संबंध बनाने की इजाजत उन्हें उनका मजहब (धर्म) देता है। इसके पक्ष में हदीस और कुरआन से जो संदर्भ वे उद्धृत करते हैं, उनमें से कुछ हैं — बुखारी, वोल्यूम 5, बुक 59, नंबर 459; बुखारी 3.34.432; बुखारी 3.46.718, 5.59.459, 7.62.135, 7.62.137, 8.77.600, 9.93.506; सहीह मुसलिम 8.3383, 8.3388, 8.3376, 8.3377; कुरआन 4.24, 4.3। बलात्कार करने के पहले ये जिहादी जमीन में लेट कर खुदा की इबादत कर यह ‘कर्म’ (दुष्कर्म) अपने खुदा (ईश्वर) को समर्पित या निवेदित करके करते हैं ताकि उन्हें पाप नहीं लगे। ईश्वर को समर्पित कर (या बिना समर्पित किए) ऐसे विकर्म या दुष्कर्म करने की अनुमति भगवद्-गीता किसी को किसी भी हालत में नहीं देती है। इसीलिए भगवान भगवद्-गीता में यह कहते हैं कि मनुष्य को कर्म, अकर्म और विकर्म को अच्छी तरह जान लेना चाहिए (4:17)।
English
Consecrating or dedicating one's actions to God is sometimes given a weird twist of interpretation. The warriors of the ISIS in Syria raped thousands of captured women, sometimes in the presence of their husbands. Before raping, however, they would prostrate themselves on the ground, pray and dedicate their act of rape to God, and then engage in forcible sex so that they would incur no sin. Immoral actions must be avoided; dedicating them to God to stop incurring sin will not do. The Bhagavad-Gitā, to preclude such misinterpretation, distinguishes between desirable and avoidable actions. The Lord clarifies that one must understand the difference between "actionlessness" (akarma), action (karma), and sinful actions (vikarma) (4:17). Rape is a vikarma and dedicating it to God while engaging in it will do no good, and won't save one from damnation.